आप सभी को श्री कृ्ष्ण जन्मोत्सव की बहुत बहुत बधाई और अशेष शुभकामनाऎँ!!!!
भारत की सभ्यता, संस्कृ्ति और दर्शन को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले और भारतीयों के उपास्य महापुरूषों में श्री रामचन्द्र जी तथा श्री कृ्ष्ण जी का नाम सबसे ऊपर आता है. इनमें भी सर्वाधिक भक्ति और पूजा भी कृ्ष्ण जी को ही मिली है. सनातन धर्म के पुराणों यथा श्रीमदभागवत तथा ब्रह्मवैवर्त और गर्ग संहिता आदि में तो श्रीकृ्ष्ण चरित्र विस्तार से है ही, वैदिक धर्म न मानने वाले बौद्ध तथा जैन धर्मों में भी उन्हे पूरी श्रद्धा मिली है. बौद्ध जातकों में भी श्रीकृ्ष्ण चरित्र उपलब्ध है, किन्तु जैन धर्म में तो उन्हे 64 श्लाका पुरूषों और भावी तीर्थंकरों में स्थान मिला है: उन्हे नवम वासुदेव स्वीकार किया गया है. इसके अतिरिक्त श्लाका पुरूषों में 'वासुदेव' नाम की पूरी श्रेणी का होना ही जैन धर्म की कृ्ष्ण के प्रति श्रद्धा का ज्वलंत उदाहरण है. यह दूसरी बात है कि हिन्दू धर्म ग्रन्थों में श्रीकृ्ष्ण जी का जो जीवन चरित्र है, उनमें प्रयाप्त अन्तर है, ओर यूँ भी अन्तर होना तो स्वाभाविक भी है.विविध हिन्दू पुराण और महाभारत श्रीकृ्ष्ण के भाईयों के विषय में मौन है, जब कि जैन पुराणों में कृ्ष्ण के साथ साथ उनके भाईयों का भी जीवन चरित्र है.जैन ग्रन्थों के अनुसार बाईसंवें तीर्थंकर भगवान अरिष्टनेमी के पिता समुद्रविजय थे, और उनके छोटे भाई वासुदेव की पत्नि देवकी से कृ्ष्ण का जन्म हुआ था. जैन आगमों और परवर्ती अनेक ग्रन्थों में भी श्रीकृ्ष्ण सम्बंधी काफी अधिक विवरण प्राप्त है. प्रस्तुत लेख में श्रीकृ्ष्ण के अन्य सात भाईयों सम्बंधी जैन और जैनेतर विवरण मात्र तुलनात्मक अध्ययन के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है.
हिन्दू धर्म ग्रन्थों के अनुसार श्रीकृ्ष्ण के जीवन चरित्र के बारे में तो प्रत्येक व्यक्ति भलीभांती परिचित ही है. श्रीमदभागवत के नवम स्कन्ध में कहा गया है कि वसुदेव के रोहिणी नामक पत्नि के गर्भ से बलराम आदि पुत्र उत्पन हुए और दूसरी पत्नि देवकी के गर्भ से श्रीकृ्ष्णादि आठ पुत्र और सुभद्रा नाम की पुत्री नें जन्म लिया. कंस द्वारा देवकी के क्रमश: छ पुत्रों को मार डाला गया, सातवाँ गर्भ जो कि शेषनाग के तेजांश से था, उस गर्भ को भगवान नें योगमाया द्वारा रोहिणी के उदर में रख दिया, जो नन्द के गोकुल में रहती थी और जाहिर कर दिया कि सातंवां गर्भ नष्ट हो गया है. इसके बाद आठवें गर्भ से श्रीकृ्ष्ण स्वयं अवतरित हुए.
इस विवरण के अनुसार देवकी के छ: गर्भ कंस द्वारा नष्ट कर दिए गए और श्रीकृ्ष्ण आठवें पुत्र थे. पर जैन आगमों का अध्ययन करने पर एक विलक्षण तथा अति महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है कि देवकी के पहले छ: पुत्र मद्दिलपुर की सुलंसा के द्वारा पालित-पोषित हुए. श्रीकृ्ष्ण देवकी के आठवें नहीं बल्कि सातवें पुत्र थे----आठवां पुत्र तो कृ्ष्ण जन्म के बहुत वर्षों बाद उत्पन हुआ, जिसका नाम था " गजसुकुमार".
जैनागमों में सबसे प्राचीन ग्रन्थ "अंग सूत्र" माने जाते हैं. उनमें से आठवें 'अंतगड्दशा' नामक सूत्र में गजसुकुमाल का स्वतन्त्र जीवन चरित्र है. उसके जीवन की पूरी कथा देने के साथ ही श्रीकृ्ष्ण जी के छ: बडे भाईयों का भी महत्वपूर्ण विवरण दिया गया है. इन सातों भाईयों का जो वृ्तान्त इस सूत्र के अध्ययन से मिलता है, उसी का सारांश यहाँ इस लेख में दिया जा रहा है............
महाभारत में एक जगह श्रीकृ्ष्ण के सौतेले छोटे भाई "गद" का उल्लेख मिलता है, और श्रीकृ्ष्ण के नामों में "गदाग्रज" और "गदपूर्वज" का भी उल्लेख है. यह भी इसी बात का सूचक है. संभव है जैन आगमों में जिसे "गजसुकुमाल" कहा गया है, उसी का "गद" के नाम से महाभारत में उल्लेख हो.
श्रीकृ्ष्ण के लघु भ्राता गजसुकुमाल:-
एकबार तीर्थंकर अरिष्टनेमी विहार करते करते द्वारिका में आ पहुंचें. उस समय उनके साथ छ: साधु थे और ये छहों एक ही माता के पेट से एक ही साथ जन्मे हुए छ: भाई थे. जैसा कि अमूमन जुडवाँ बच्चों में देखने में आता है, उन छहों भाईयों की आकृ्ति और रंगरूप भी बिल्कुल एक समान था, सब के सब श्याम वर्ण के थे. उन्होने जिस दिन दीक्षा ली थी, उसी दिन से अरिष्टनेमी भगवान की आज्ञा से निरन्तर द्वि बेला का उपवास करते रहने का नियम ले लिया था.द्वारिका में आने के बाद अपने उपवास के पारणे का समय होने पर, वे दो दो की टुकडी में विभक्त होकर भिक्षा माँगने निकले. पहले दो जन घर घर भिक्षा माँगते हुए वसुदेव पत्नि देवकी के घर पर आए. देवकी नें उन्हे बडे ही हर्षित मन से केसर के लडुओं की भिक्षा देकर वंदन-नमस्कार सहित विदा किया.
तदन्तर, उनमें से दूसरे दो भाई भी भिक्षा माँगते मांगते देवकी के द्वार पर आन खडे हुए. उनको भी देवकी नें वही लडुओं की भिक्षा देकर विदा कर दिया.
थोडी ही देर बाद, शेष दो भाईयों की तीसरी टुकडी भी फिरती फिरती देवकी के यहाँ ही पहुँच गई. देवकी नें उन्हे भिक्षा तो दे दी लेकिन ये कह भी दिया कि वासुदेव की इतनी बडी द्वारिका नगरी में श्रमणों को कहीं भिक्षा ही नहीं मिलती, जो वे बारबार एक ही घर में भिक्षा मांगने आ जाते हैं.
अब उन लोगों नें बताया कि हम एक ही घर में दोबारा से भिक्षा मांगने नहीं जा सकते. हम छ: भाई हैं मद्दिलपुर नगर के नाग नामक गृ्हस्थ के पुत्र हैं. हमने हमारी माता सुलसा के गर्भ से एक ही साथ जन्म लिया है. हम सब की आकृ्ति और रंगरूप भी बिल्कुल एक समान ही है, इसलिए आपको ऎसा लगा कि दो ही भिक्षुक बारबार एक ही घर से भिक्षा मांगने आ रहे हैं.
इतना कहकर साधु तो अपने रास्ते चले गए, लेकिन जाते जाते देवकी को एक सोच में डाल गए....वो ये कि उसके बाल्यकाल में मुक्तक ऋषि नें उनके बारे में एक भविष्यवाणी की थी, कि तुम्हारे गर्भ से एक ही समान वर्ण और आकृ्ति के नल-कुबेर जैसे आठ पुत्र जन्म लेंगें. समस्त संसार में अन्य किसी भी स्त्री को वैसे पुत्र नहीं होंगें. पर यहाँ तो प्रत्यक्ष ही उनका वचन असत्य होता हुआ दिख रहा है. सम्पूर्ण विश्व तो क्या, मालूम होता है कि यहाँ तो भारत खंड में भी अन्य स्त्रियाँ ऎसी हैं कि जिनके एक ही जैसे जन्मे हुए नल कुबेर जैसे पुत्र हैं. सोच में डूबी देवकी इस बात का स्पष्टीकरण पूछने अरिष्टनेमी भगवान के पास पहुँचती है..........
कथा का शेष भाग----ब्रेक के बाद :)



19 टिप्पणियाँ:
Shri krishan janmastami ki Shoobhkaamnaayen.
पडित जी,
आपने कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर जैन आगम में से 'गजसकुमाल' अध्यन पर सारगर्भित आलेख प्रस्तूत कर हमें उपकृत किया आभार।
यह आगम 'अंतगड्दशा' अर्थार्त अंतकृत-दशा है।
अर्थ है वे दस जिन्होने इसी भव में संसारचक्र का अंत कर लिया।सम्भव हो तो 'अतंगदशा' की जगह 'अंतगड्दशा'कर लें।
"गजसुकुमार" नहिं 'गजसकुमाल'है, गज के तालु के समान सुकोमल काया से नमाभिमान है।
आभार व्यक्त करता हूं वृतांत सत्यतापूर्ण शास्त्रानुसार अभिव्यक्त हुआ है।
janmastami ki Shoobhkaamnaayen.
सुन्दर, सुपाठ्य और उत्तम प्रस्तुति..........
धन्यवाद !
@हंसराज जी,
त्रुटि की ओर ध्यानाकर्षण के लिए आपका धन्यवाद...
हालाँकि श्री गुणभद्र जैन रचित "जैन भारत-भारती" में नाम गजसुकुमाल ही बताया हुआ है....लेकिन मेरी अपनी मति सुकुमाल को सुकुमार के रूप में देखती रही...
पुनः उपकृत हुआ पंडित जी, यथा नाम तथा गुण, आप विद्वान पंडित है, साथ ही विद्वत्ता ने आपको विनयशीलता भी बक्षी है।
त्रुटि का सहानुभुतिपूर्ण सुधार को अवसर देकर।
जैनों के पर्युषण 5 सितम्बर से प्रारम्भ होने जा रहे है, आठ दिनो के पर्व में अंतिम दिन सम्वत्सरी को छोड सातों दिन इसी आगम-सूत्र 'अंतगड्दशा' का वांचन (पठन)होता है।
कृष्ण जन्माष्टमी और पर्युषण पर आपने समयोचित आलेख दिया है। आभार
अति सामयिक आलेख के लिये आभार, जन्माष्टमी की घणी रामराम.
रामराम.
वत्स जी हमारे लिये तो यह नयी जानकारी है जी, बहुत अच्छी लगी, धन्यवाद
मैं भी ब्रेक के बाद ही टिप्पणी दूंगा :)
पंडित जी आज तो आप बहुत ही विचित्र सी जानकारी लेकर आए/हमेम तो ज्ञात ही नहीं था कि जैन और बौद्ध साहित्य में भी हिन्दू देवी-देवताओ का वर्णन किया गया है/ आज श्रीकृ्ष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर इससे उम्दा पोस्ट कोई भी नहीं हो सकती/
प्रणाम/
पंडित जी आज तो आप बहुत ही विचित्र सी जानकारी लेकर आए/हमेम तो ज्ञात ही नहीं था कि जैन और बौद्ध साहित्य में भी हिन्दू देवी-देवताओ का वर्णन किया गया है/ आज श्रीकृ्ष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर इससे उम्दा पोस्ट कोई भी नहीं हो सकती/
प्रणाम/
शुक्रिया इस जानकारी के लिए.
श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये..बढ़िया आलेख...
श्री कृष्ण जन्माष्ठमी की बहुत-बहुत बधाई, ढेरों शुभकामनाएं!
बहुत ही जानकारी ......आभार
मुस्कुराना चाहते है तो यहाँ आये :-
(क्या आपने भी कभी ऐसा प्रेमपत्र लिखा है ..)
(क्या आप के कंप्यूटर में भी ये खराबी है .... )
http://thodamuskurakardekho.blogspot.com
बहुत बढ़िया प्रस्तुति ....
भाषा का सवाल सत्ता के साथ बदलता है.अंग्रेज़ी के साथ सत्ता की मौजूदगी हमेशा से रही है. उसे सुनाई ही अंग्रेज़ी पड़ती है और सत्ता चलाने के लिए उसे ज़रुरत भी अंग्रेज़ी की ही पड़ती है,
हिंदी दिवस की शुभ कामनाएं
एक बार इसे जरुर पढ़े, आपको पसंद आएगा :-
(प्यारी सीता, मैं यहाँ खुश हूँ, आशा है तू भी ठीक होगी .....)
http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_14.html
पंडित जी काफी लंबा ब्रेक हो गया है। इतना तो टीवी वाले भी समाचार के वक्त नहीं लेते। इंतजार है पूरी कथा का। पहली बार ज्ञात हुआ कि भगवान के छह और बड़े भाई भी थे। इंतजार लंबा न कराइए।
ताऊ पहेली ९५ का जवाब -- आप भी जानिए
http://chorikablog.blogspot.com/2010/10/blog-post_9974.html
भारत प्रश्न मंच कि पहेली का जवाब
http://chorikablog.blogspot.com/2010/10/blog-post_8440.html
लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।
जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!
मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।
भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!
अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।
थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।
http://umraquaidi.blogspot.com/
उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
“उम्र कैदी”
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