बैजिक एवं गार्भिक दोषों की निवृ्ति के साथ साथ इस जीवन को ब्रह्मप्राप्ति के योग्य बनाना ही संस्कारों का एकमात्र उदेश्य है.इससे पूर्व के आलेख में बताए गए गर्भावस्था के वे तीन संस्कार मुख्यत: गर्भस्थ शिशु की शारीरिक पूर्णता की दृ्ष्टि से होते हैं. क्यों कि अन्तस्थ शिशु के लिए उसके प्रत्येक अव्यव अर्थात सर्वांग की पुष्टि की आवश्यकता रहती है. यदि क्रिया न भी हो सके तब भी मन्त्रों में जो अलौकिक अचिन्त्य शक्ति रहती है, केवल उसका श्रवण और उच्चारण ही अपना प्रभाव डालते हैं. शास्त्रोक्त क्रिया का अनुष्ठान मन्त्र न बोलने पर भी एक विशेष भाव को जन्म देता है, जिससे गर्भस्थ शिशु की पुष्टि होती है.
जातकर्म संस्कार शिशु के उत्पन होने पर होता है किन्तु नालच्छेदन से पूर्व. अपने माता-पिता के साथ उसके सम्बंध को दृ्ड करने की यह एक पद्धति है. पुत्र, पिता के अंग-अंग का रस है. वह पिता के ह्रदय का ही मूर्त पिण्ड है. समझिए कि पिता ही पुत्र के रूप में प्रकट हुआ है. उपनिषदों में इसी कारण से पत्नि को "जाया" कहा गया है. पिता पत्नि के द्वारा पुत्र रूप में प्रकट होता है. "बीज" पिता--"क्षेत्र" माता. यह जातकर्म संस्कार पुत्र के ह्रदय में माता-पिता के प्रति श्रद्धा एवं आदर युक्त सम्बन्ध उत्पन करता है यही संस्कार विकसित होकर 'मातृ देवो भव:', 'पितृ देवो भव:' के भाव को दृ्ड करता है. यह कहने की आवश्यकता नहीं कि गर्भस्थ शिशु के संस्कार स्थूल शरीर की पुष्टि के लिए होते हैं और जातकर्म आदि संस्कार जीवन कालीन भावों की परिपुष्टि के लिए होते हैं.
नामकरण संस्कार अपने पूर्वजों के साथ सम्बन्ध की परिपुष्टि के अनन्तर स्वविषयक योग्यता का आधान करने के लिए होता है. नाम ऎसा होना चाहिए जो अपनी प्राचीन परम्परा के साथ कडी जोडकर नवीन नवीन गुणों का समुन्मेष करने वाला हो. प्राकृ्त वस्तुओं के नाम, परिणाम क्रम से होते हैं. प्राकृ्त परिणाम के अन्तिम रूप पंचभूत हैं, अन्य सब रूप कार्याभास ही हैं. समष्टि से पृ्थक व्यष्टि का नामकरण देश, काल, जाति, सम्प्रदाय, परिवार-परम्परा के अनुरूप होता है. ये नाम जब शास्त्रोक्त रीति से रखे जाते हैं तो यज्ञ यागादि कार्य में इनके द्वारा संकल्प करने की योग्यता आती है. नाम में अचिन्त्य शक्ति होती है. वह सूक्ष्म शरीर में सुषुप्त सदगुणों को जगाता है. इसी के साथ मन्त्र पूत नाम, अन्त:करण शुद्धि में भी सहायक होता है. तभी सनातन धर्मावलम्बियों में आज भी प्राय: सच्चिदानन्द वाचक नाम रखे जाते हैं.
अन्नप्राशन संस्कार---माता के रस रक्त से ही बालक के शरीर की पुष्टि होती है. अत: माता का दूध शिशु के लिए सर्वापेक्षया अधिक हितकारी होता है. परन्तु अन्तस्थ भावना की परिपुष्टि के लिए अन्न की विशेष आवश्यकता होती है. अन्न से ही 'मन' बनता है. 'जल' से 'प्राण' और 'तेज' से 'वाक'. अन्न में इन तीनों का ही समावेश है. यदि अन्न पवित्र एवं योग्य होगा तो शरीर में मन, प्राण एवं वाणी का विकास होगा. अतैव "अन्नप्राशन संस्कार" केवल लौकिक बल की वृ्द्धि एवं संरक्षण के लिए ही आवश्यक नहीं है, इसके द्वारा अध्ययन एवं चिन्तन के बल की भी प्राप्ति होती है. व्यवहारिक जगत का मूलभूत उपादान अन्न ही है. अतएव अन्नप्राशन एक ऎसा संस्कार है, जो कि मनुष्य की उन्नति में सहायक है. मन्त्र, देवता, पारम्परिक संस्कार, एवं ब्राह्मण, माता-पिता के आशीर्वाद से अन्न में बल, बुद्धि एवं भोजन मर्यादा की प्रतिष्ठा होती है. 'अन्न बहु कुर्वीत' अन्न का आदर करना चाहिए. यह संस्कार बाल्यवस्था में ही होना आवश्यक है....
क्रमश:........




11 टिप्पणियाँ:
पंडित जी,
बहुत बहुत ज्ञानवर्धक आलेख,
संसकारों पर सारगर्भित सुंदर विवेचन
आभार आपका।
pandit ji behad pandityapurn aalekh!
behad anukarniy
pandit ji behad pandityapurn aalekh!
behad anukarniy
पंडित जी, बहुत ही उपयोगी जानकारी और आपने बडे सुन्दर ढंग से संस्कार की महत्ता को समझाया है/
प्रणाम/
संस्कारों के बारे में यह श्रंखला शुरु करके आपने बहुत सुंदर काम किया है. हमारी संस्कृति के ये अनिवार्य अंग थे जिनका महत्व था, आज लोग इसके बारे भूलते जारहे हैं. बहुत आभार.
रामराम.
अत्यंत सूचनाप्रद पोस्ट ! जब लोग संस्कारों से अपरिचित हो चले हैं तब आप उन्हें रास्ता दिखा रहे हैं !
धन्यवाद जी इस सुंदर जानकारी के लिये
वत्स जी षोडश संस्कारों के बारे में दी गई इस जानकारी के लिए आप साधुवाद के पात्र हैं धन्यवाद
कई लोग पारंपरिक संस्कारों का पालन तो करते हैं मगर उसकी शुरूआत का कारण या वैज्ञानिक आधार पता नहीं होता। आपने बताकर अच्छा किया।
आपका ब्लाग अच्छा लगा .ग्राम चौपाल मे आने के लिए धन्यवाद .आगे भी मिलते रहेंगें
वत्स जी ! अभिवादन !! आपका संस्कार विषयक आलेख पढा, अच्छा लगा। मैं ब्लागिंग के क्षेत्र में नवागत हूँ। यदि समय मिले तो मेरा आलेख पढकर उत्साहवर्धन करें। http://drst11.blogspot.com/.
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