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शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

संस्कार विज्ञान------(प्रथम भाग)

किसी भी मनुष्य में अपने पूर्वजन्म के कर्मों के संस्कार तो रहते ही हैं. गर्भ के, माता-पिता के, उनकी वंशानुगत क्रमधारा के भी संस्कार रहते हैं. अब संस्कार हैं तो उनमें से कुछ अच्छे होंगें तो कुछ बुरे भी. बुरे संस्कारों को विकार कहा जाता है. जो जडता की ओर ले जाए सो विकार. जो भीतर के विकारों को मिटा दे वो संस्कार. संस्कार माने सँवारना, सुधारना. जैसे-----दर्पण को स्वच्छ करना, चमकाना. जैसे रत्न जब खान से निकाला जाता है तो उसमें मिट्टी लगी होती है, बेडौल होता है. उसको साफ करते हैं, चमकाते हैं; छंटाई-घिसाई भी करते हैं और पालिश भी. उसकी चमक, स्निग्धता प्रकट हो जाने पर भी , उसे पिरोने के लिए जो छिद्राभाव होता है. उसकी भी छिद्र करके पूर्ती की जाती है. हमारे संस्कार भी कुछ इसी प्रकार के हैं. बीजगत और गर्भगत दोषों को मिटाना और जीवन को चेतनोन्मुख करके पुरूषार्थ की प्राप्ति के योग्य बनाना संस्कारों का प्रयोजन है. इसी को हमारे शास्त्रों में दोषापनयन, गुणाधान एवं हीनांगपूर्ती के नाम से कहा गया है.
जैसे मन्दिर में देवता की स्थापना के लिए शुद्धि की जाती है, वैसे ही माता के गर्भाशय में बीज की स्थापना के लिए भूमी शुद्धि अथवा पीठ शुद्धि आवश्यक है. बाह्य रूप से शरीर शुद्धिकरण के लिए जैसे अनेक प्रक्रियाएं हैं, उसी प्रकार आन्तर पीठ शुद्धि के लिए शास्त्रीय संस्कार क्रिया अपनाई जाती है. शुभ समय, शुभ स्थल, मन्त्रोचारण, देवता का अनुग्रह एवं गर्भाधान के पूर्वांग----जीव-चैतन्य-रूप महती शक्ति के प्रतिष्ठापन की योग्यता उत्पन करते हैं. यह सम्पूर्ण क्रिया शब्द शक्ति के प्रवाह एवं संकल्पयुक्त क्रिया के द्वारा ही सम्पन्न की जाती है.
पुंसवन संस्कार में मन्त्र, देवानुग्रह, माता-पिता के शुभ संकल्प के साथ साथ औषधी विशेष का भी प्रयोग होता है. इससे भावी संतान दीर्घायु, स्वस्थ, सुन्दर, हष्ट-पुष्ट, बलिष्ठ, तेजस्वी, बुद्धिमान एवं सदाचार-सम्पन्न होती है. वह पुत्र हो अथवा पुत्री, इस संस्कार से सदाचार सदभाव एवं सदगुण की सम्पदा निश्चित रूप से प्राप्त होती है.
सीमोन्तोनयन संस्कार से माता के चित्त का प्रसादन होता है. माता का मन तृ्प्त, संतुष्ठ एवं प्रसन्न रहे, उसका प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर तो पूर्ण रूप से पडता ही है. जिससे कि उसके शरीर में सुखी रहने की क्षमता उत्पन होती है. यदि माता उदास, निराश, दुखी, रोती-कलपती एवं भविष्य के प्रति घबराहट लिए हुए रहे तो बालक पर उसका प्रभाव भी तो वैसा ही होगा. सो, इसलिए इस संस्कार में पिता उसके सुख सौमनस्य का सारा उतरदायित्व सम्भाल लेता है, जिससे कि वह निश्चिंत रहे. 
गर्भावस्था के ये तीन संस्कार मुख्यत: गर्भस्थ शिशु की शारीरिक पूर्णता की दृ्ष्टि से होते हैं, क्योंकि अन्तस्थ शिशु के लिए उसके प्रत्येक अवयव अर्थात सर्वांग की पुष्टि की आवश्यकता रहती है. यदि क्रिया न भी हो सके तब भी मन्त्रों में जो अलौकिक अचिन्त्य शक्ति रहती है, केवल उसका श्रवण और उच्चारण भी अपना वही प्रभाव डालता हैं, जो कि इस सम्पूर्ण क्रिया का है. और शास्त्रोक्त क्रिया का अनुष्ठान मन्त्र न बोलने पर भी एक विशेष भाव को जन्म देता है, जिससे गर्भस्थ शिशु की पुष्टि होती है.

( हम भले ही संस्कारों से संस्कृ्त न हों किन्तु हमें संस्कारों का ज्ञान रखना आवश्यक है. अत एव मूलभूत संस्कारों का विस्तृ्त विवेचन ही इस लेखमाला का उदेश्य है. प्रस्तुत पोस्ट को इस अति महत्वपूर्ण विषय की एक भूमिका मात्र ही समझा जाए. आगामी लेख में बात करते हैं---शिशु के जन्म लेने के पश्चात किए जाने वाले संस्कारों के विषय में )

19 टिप्पणियाँ:

सुज्ञ ने कहा…

पंडित जी,
स्तूत्य ज्ञानवर्धक आलेख!

अनाम ने कहा…

pandit ji behad pandityapurn aalekh/ aagaami post ki pratiksha rahegi/

अनाम ने कहा…

pandit ji behad pandityapurn aalekh/ aagaami post ki pratiksha rahegi/

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

अति ज्ञानवर्धक पोस्ट, शुभकामनाएं.

रामराम.

ali ने कहा…

संस्कारों से परिचय कराना ! एक बढ़िया , अनुकरणीय विचार !

कृ्ष्णा ने कहा…

पंडित जी हिन्दू संस्कार पद्धति विषय पर लिखने के लिए तो मैं आपसे अग्रह करने ही वाला था/प्रारम्भिक जानकारी बहुत अच्छे तरीके से समझ में आ गई/अब आगामी पोस्ट की प्रर्तीक्षा कर रहा हूं/
प्रणाम/

(वर्डप्रेस की किसी त्रुटि के कारण कल से अपनी मूल आईडी के जरिए कहीं भी कमेन्ट नहीं कर पा रहा हूँ)

राज भाटिय़ा ने कहा…

पं.डी.के.शर्मा"वत्स जी बहुत ही सुंदर ओर सरल ढंग्से आप ने इस कठिन बात को समझाया. धन्यवाद

Sandeep Tyagi ने कहा…

really good post

अल्पना वर्मा ने कहा…

यह तो विज्ञान भी मानता है कि माता की मानसिक स्थिति का प्रभाव होने वाली संतान पर पड़ता है.
-हमें इन संस्कारों का ज्ञान होना आवश्यक है.
-पोस्ट ज्ञानवर्धक है .

कुमार राधारमण ने कहा…

हाल ही में,असाधारण प्रतिभा संपन्न तथागत तुलसी के पिता ने भी स्वीकार किया है कि उनका बेटा संतान के जन्म की "पूर्व तैयारियों" का ही फल है.

Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…

उपयोगी जानकारी और आपने सुन्दर ढंग से संस्कार की महत्ता को समझाया है |

गर्भ के किस माह में कौन से संस्कार करने चाहिए ये भी बता देते तो और अच्छा रहता | ज्यादातर मंदिरों में या पंडितों को इन सब के बारे में मालुम नहीं इसलिए विधि की चर्चा भी किसी पोस्ट में करें |

अगले भाग का बेसब्री से इन्तजार कर रहा हूँ | हो सके तो आवश्यक संस्कार के लिए बच्चे की आवश्यक उम्र भी समाहित करें |

Dr.Bhawna ने कहा…

ज्ञानवर्धक आलेख...

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ ने कहा…

बुरे संस्कारों को विकार कहा जाता है. जो जडता की ओर ले जाए सो विकार. जो भीतर के विकारों को मिटा
दे वो संस्कार. संस्कार माने सँवारना, सुधारना. जैसे-----दर्पण को स्वच्छ ..@ पंडित जी अन्यथा न लें ।
संस्कार का अर्थ । सन यानी से या उसके द्वारा और कार यानी करना । अच्छे बुरे दोनों संस्कार
आत्म ग्यान की दृष्टि से बाधक है । कबीर ने कहा । चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय । दो
पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय । ये दो पाट पाप और पुण्य के हैं । भक्ति द्वारा दोनों प्रकार
के संस्कार या जिसको आत्म ग्यान की भाषा में कारण बीज कहा जाता है । इन्हीं को जलाया जाता
है । ताकि ये फ़िर अंकुरित होकर जन्म लेने का कारण न बने । और यही सच्चे अर्थों में मुक्त होना
या खुद को जानना है । ..@ संस्कार माने सँवारना, सुधारना..आप बारीकी से निरीक्षण करना ये संस्कार
नहीं विवेक या प्रग्या बुद्धि से होता है । आपने ( श्री विनय शर्मा के लेख से ..जाना ) कहीं लिखा है ।
अंतकरण में गुरु होता है ..? ये बात भी गलत है । आप फ़िर से देखना । आंतरिक गुरु होता है ।
अंतकरण में नहीं । इसी अंतकरण में फ़ंसे होने के कारण जीव ( केवल मनुष्य़ ) खुद को नही
जान पाता । मन बुद्धि चित्त अहम । इन चार से अंतकरण बनता है । और इन चारों को एक में
समायोजित करने पर सुरति बन जाती है । और सुरति के ऊपर उठते ही मनुष्य के लिये अदृष्य सत्ता
और प्रकृति के रहस्य उसी तरह देखे जा सकते हैं । जैसे किसी ऊंची इमारत पर चडकर आराम से
शहर को देख सकते हैं । satguru-satykikhoj.blogspot.com

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ ने कहा…

बुरे संस्कारों को विकार कहा जाता है. जो जडता की ओर ले जाए सो विकार. जो भीतर के विकारों को मिटा
दे वो संस्कार. संस्कार माने सँवारना, सुधारना. जैसे-----दर्पण को स्वच्छ ..@ पंडित जी अन्यथा न लें ।
संस्कार का अर्थ । सन यानी से या उसके द्वारा और कार यानी करना । अच्छे बुरे दोनों संस्कार
आत्म ग्यान की दृष्टि से बाधक है । कबीर ने कहा । चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय । दो
पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय । ये दो पाट पाप और पुण्य के हैं । भक्ति द्वारा दोनों प्रकार
के संस्कार या जिसको आत्म ग्यान की भाषा में कारण बीज कहा जाता है । इन्हीं को जलाया जाता
है । ताकि ये फ़िर अंकुरित होकर जन्म लेने का कारण न बने । और यही सच्चे अर्थों में मुक्त होना
या खुद को जानना है । ..@ संस्कार माने सँवारना, सुधारना..आप बारीकी से निरीक्षण करना ये संस्कार
नहीं विवेक या प्रग्या बुद्धि से होता है । आपने ( श्री विनय शर्मा के लेख से ..जाना ) कहीं लिखा है ।
अंतकरण में गुरु होता है ..? ये बात भी गलत है । आप फ़िर से देखना । आंतरिक गुरु होता है ।
अंतकरण में नहीं । इसी अंतकरण में फ़ंसे होने के कारण जीव ( केवल मनुष्य़ ) खुद को नही
जान पाता । मन बुद्धि चित्त अहम । इन चार से अंतकरण बनता है । और इन चारों को एक में
समायोजित करने पर सुरति बन जाती है । और सुरति के ऊपर उठते ही मनुष्य के लिये अदृष्य सत्ता
और प्रकृति के रहस्य उसी तरह देखे जा सकते हैं । जैसे किसी ऊंची इमारत पर चडकर आराम से
शहर को देख सकते हैं । satguru-satykikhoj.blogspot.com

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ ने कहा…

बुरे संस्कारों को विकार कहा जाता है. जो जडता की ओर ले जाए सो विकार. जो भीतर के विकारों को मिटा
दे वो संस्कार. संस्कार माने सँवारना, सुधारना. जैसे-----दर्पण को स्वच्छ ..@ पंडित जी अन्यथा न लें ।
संस्कार का अर्थ । सन यानी से या उसके द्वारा और कार यानी करना । अच्छे बुरे दोनों संस्कार
आत्म ग्यान की दृष्टि से बाधक है । कबीर ने कहा । चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय । दो
पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय । ये दो पाट पाप और पुण्य के हैं । भक्ति द्वारा दोनों प्रकार
के संस्कार या जिसको आत्म ग्यान की भाषा में कारण बीज कहा जाता है । इन्हीं को जलाया जाता
है । ताकि ये फ़िर अंकुरित होकर जन्म लेने का कारण न बने । और यही सच्चे अर्थों में मुक्त होना
या खुद को जानना है । ..@ संस्कार माने सँवारना, सुधारना..आप बारीकी से निरीक्षण करना ये संस्कार
नहीं विवेक या प्रग्या बुद्धि से होता है । आपने ( श्री विनय शर्मा के लेख से ..जाना ) कहीं लिखा है ।
अंतकरण में गुरु होता है ..? ये बात भी गलत है । आप फ़िर से देखना । आंतरिक गुरु होता है ।
अंतकरण में नहीं । इसी अंतकरण में फ़ंसे होने के कारण जीव ( केवल मनुष्य़ ) खुद को नही
जान पाता । मन बुद्धि चित्त अहम । इन चार से अंतकरण बनता है । और इन चारों को एक में
समायोजित करने पर सुरति बन जाती है । और सुरति के ऊपर उठते ही मनुष्य के लिये अदृष्य सत्ता
और प्रकृति के रहस्य उसी तरह देखे जा सकते हैं । जैसे किसी ऊंची इमारत पर चडकर आराम से
शहर को देख सकते हैं । satguru-satykikhoj.blogspot.com

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ ने कहा…

बुरे संस्कारों को विकार कहा जाता है. जो जडता की ओर ले जाए सो विकार. जो भीतर के विकारों को मिटा
दे वो संस्कार. संस्कार माने सँवारना, सुधारना. जैसे-----दर्पण को स्वच्छ ..@ पंडित जी अन्यथा न लें ।
संस्कार का अर्थ । सन यानी से या उसके द्वारा और कार यानी करना । अच्छे बुरे दोनों संस्कार
आत्म ग्यान की दृष्टि से बाधक है । कबीर ने कहा । चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय । दो
पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय । ये दो पाट पाप और पुण्य के हैं । भक्ति द्वारा दोनों प्रकार
के संस्कार या जिसको आत्म ग्यान की भाषा में कारण बीज कहा जाता है । इन्हीं को जलाया जाता
है । ताकि ये फ़िर अंकुरित होकर जन्म लेने का कारण न बने । और यही सच्चे अर्थों में मुक्त होना
या खुद को जानना है । ..@ संस्कार माने सँवारना, सुधारना..आप बारीकी से निरीक्षण करना ये संस्कार
नहीं विवेक या प्रग्या बुद्धि से होता है । आपने ( श्री विनय शर्मा के लेख से ..जाना ) कहीं लिखा है ।
अंतकरण में गुरु होता है ..? ये बात भी गलत है । आप फ़िर से देखना । आंतरिक गुरु होता है ।
अंतकरण में नहीं । इसी अंतकरण में फ़ंसे होने के कारण जीव ( केवल मनुष्य़ ) खुद को नही
जान पाता । मन बुद्धि चित्त अहम । इन चार से अंतकरण बनता है । और इन चारों को एक में
समायोजित करने पर सुरति बन जाती है । और सुरति के ऊपर उठते ही मनुष्य के लिये अदृष्य सत्ता
और प्रकृति के रहस्य उसी तरह देखे जा सकते हैं । जैसे किसी ऊंची इमारत पर चडकर आराम से
शहर को देख सकते हैं । satguru-satykikhoj.blogspot.com

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ ने कहा…

बुरे संस्कारों को विकार कहा जाता है. जो जडता की ओर ले जाए सो विकार. जो भीतर के विकारों को मिटा
दे वो संस्कार. संस्कार माने सँवारना, सुधारना. जैसे-----दर्पण को स्वच्छ ..@ पंडित जी अन्यथा न लें ।
संस्कार का अर्थ । सन यानी से या उसके द्वारा और कार यानी करना । अच्छे बुरे दोनों संस्कार
आत्म ग्यान की दृष्टि से बाधक है । कबीर ने कहा । चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय । दो
पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय । ये दो पाट पाप और पुण्य के हैं । भक्ति द्वारा दोनों प्रकार
के संस्कार या जिसको आत्म ग्यान की भाषा में कारण बीज कहा जाता है । इन्हीं को जलाया जाता
है । ताकि ये फ़िर अंकुरित होकर जन्म लेने का कारण न बने । और यही सच्चे अर्थों में मुक्त होना
या खुद को जानना है । ..@ संस्कार माने सँवारना, सुधारना..आप बारीकी से निरीक्षण करना ये संस्कार
नहीं विवेक या प्रग्या बुद्धि से होता है । आपने ( श्री विनय शर्मा के लेख से ..जाना ) कहीं लिखा है ।
अंतकरण में गुरु होता है ..? ये बात भी गलत है । आप फ़िर से देखना । आंतरिक गुरु होता है ।
अंतकरण में नहीं । इसी अंतकरण में फ़ंसे होने के कारण जीव ( केवल मनुष्य़ ) खुद को नही
जान पाता । मन बुद्धि चित्त अहम । इन चार से अंतकरण बनता है । और इन चारों को एक में
समायोजित करने पर सुरति बन जाती है । और सुरति के ऊपर उठते ही मनुष्य के लिये अदृष्य सत्ता
और प्रकृति के रहस्य उसी तरह देखे जा सकते हैं । जैसे किसी ऊंची इमारत पर चडकर आराम से
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राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ ने कहा…

बुरे संस्कारों को विकार कहा जाता है. जो जडता की ओर ले जाए सो विकार. जो भीतर के विकारों को मिटा
दे वो संस्कार. संस्कार माने सँवारना, सुधारना. जैसे-----दर्पण को स्वच्छ ..@ पंडित जी अन्यथा न लें ।
संस्कार का अर्थ । सन यानी से या उसके द्वारा और कार यानी करना । अच्छे बुरे दोनों संस्कार
आत्म ग्यान की दृष्टि से बाधक है । कबीर ने कहा । चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय । दो
पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय । ये दो पाट पाप और पुण्य के हैं । भक्ति द्वारा दोनों प्रकार
के संस्कार या जिसको आत्म ग्यान की भाषा में कारण बीज कहा जाता है । इन्हीं को जलाया जाता
है । ताकि ये फ़िर अंकुरित होकर जन्म लेने का कारण न बने । और यही सच्चे अर्थों में मुक्त होना
या खुद को जानना है । ..@ संस्कार माने सँवारना, सुधारना..आप बारीकी से निरीक्षण करना ये संस्कार
नहीं विवेक या प्रग्या बुद्धि से होता है । आपने ( श्री विनय शर्मा के लेख से ..जाना ) कहीं लिखा है ।
अंतकरण में गुरु होता है ..? ये बात भी गलत है । आप फ़िर से देखना । आंतरिक गुरु होता है ।
अंतकरण में नहीं । इसी अंतकरण में फ़ंसे होने के कारण जीव ( केवल मनुष्य़ ) खुद को नही
जान पाता । मन बुद्धि चित्त अहम । इन चार से अंतकरण बनता है । और इन चारों को एक में
समायोजित करने पर सुरति बन जाती है । और सुरति के ऊपर उठते ही मनुष्य के लिये अदृष्य सत्ता
और प्रकृति के रहस्य उसी तरह देखे जा सकते हैं । जैसे किसी ऊंची इमारत पर चडकर आराम से
शहर को देख सकते हैं । satguru-satykikhoj.blogspot.com

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ ने कहा…

बुरे संस्कारों को विकार कहा जाता है. जो जडता की ओर ले जाए सो विकार. जो भीतर के विकारों को मिटा
दे वो संस्कार. संस्कार माने सँवारना, सुधारना. जैसे-----दर्पण को स्वच्छ ..@ पंडित जी अन्यथा न लें ।
संस्कार का अर्थ । सन यानी से या उसके द्वारा और कार यानी करना । अच्छे बुरे दोनों संस्कार
आत्म ग्यान की दृष्टि से बाधक है । कबीर ने कहा । चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय । दो
पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय । ये दो पाट पाप और पुण्य के हैं । भक्ति द्वारा दोनों प्रकार
के संस्कार या जिसको आत्म ग्यान की भाषा में कारण बीज कहा जाता है । इन्हीं को जलाया जाता
है । ताकि ये फ़िर अंकुरित होकर जन्म लेने का कारण न बने । और यही सच्चे अर्थों में मुक्त होना
या खुद को जानना है । ..@ संस्कार माने सँवारना, सुधारना..आप बारीकी से निरीक्षण करना ये संस्कार
नहीं विवेक या प्रग्या बुद्धि से होता है । आपने ( श्री विनय शर्मा के लेख से ..जाना ) कहीं लिखा है ।
अंतकरण में गुरु होता है ..? ये बात भी गलत है । आप फ़िर से देखना । आंतरिक गुरु होता है ।
अंतकरण में नहीं । इसी अंतकरण में फ़ंसे होने के कारण जीव ( केवल मनुष्य़ ) खुद को नही
जान पाता । मन बुद्धि चित्त अहम । इन चार से अंतकरण बनता है । और इन चारों को एक में
समायोजित करने पर सुरति बन जाती है । और सुरति के ऊपर उठते ही मनुष्य के लिये अदृष्य सत्ता
और प्रकृति के रहस्य उसी तरह देखे जा सकते हैं । जैसे किसी ऊंची इमारत पर चडकर आराम से
शहर को देख सकते हैं । satguru-satykikhoj.blogspot.com

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