![]() |
| श्री वेद व्यास जी |
शिक्षा का प्राचीन भारत में कितना महत्व था, इसे इसी से समझा जा सकता है कि गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक के 16 संस्कारों में 'विद्यारम्भ` को एक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। बच्चा किसी भी वर्ग, वर्ण या लिंग का हो, उसके लिए शिक्षा अनिवार्य और नि:शुल्क थी। निर्धन बालक सुदामा और राजपरिवार के श्रीकृष्ण सांदीपनि गुरु के पास एक साथ पढ़ते थे। गुरुकुल में गुरु और गुरुपत्नी के सान्निध्य में सब बच्चे एक परिवार की तरह रहते थे। इस प्रकार मिले संस्कार जीवन भर अमिट रहना स्वाभाविक ही है।
एक बात ओर कि, तब शिक्षा का अर्थ केवल किताबी ज्ञान नहीं था। इसीलिए भाषा, राजनीति, भौतिकी, कला, चिकित्सा, रसायन,विज्ञान, कूटनीति और तंत्र-मंत्र की शिक्षा के साथ ही लकड़ी काटने, खेती करने, गोपालन से लेकर रसोई तक के काम छात्र प्रसन्नता से करते थे। शिक्षा पूरी होने पर बच्चे के अभिभावक अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार गुरु को जो भी देते थे, वे उसे प्रेम से स्वीकार करते थे। वह गांवों की जागीर से लेकर लौंग के दो दाने तक कुछ भी हो सकता था। साम्यवादी भले ही कितना ढिंढोरा पीटें; पर समता और समानता का ऐसा उदाहरण इतिहास में मिलना कठिन है।
यहां हमें शिक्षा और विद्या का अंतर भी समझना होगा। शिक्षा का अर्थ जहां व्यावहारिक जीवन के लिए उपयोगी ज्ञान है, वहां विद्या का अर्थ व्यावहारिक के साथ ही सामाजिक ज्ञान भी है। विद्या में वह सब संस्कार आते हैं, जिनसे व्यक्ति सामाजिक और राष्ट्रीय प्राणी बनता है। विद्या हर व्यक्ति को 'मैं और मेरा` से ऊपर उठकर 'हम और हमारा` की ओर जाने को प्रेरित करती है। इसीलिए कहा है सा विद्या या विमुक्तये। अर्थात विद्या व्यक्ति को उसके जीवन में व्याप्त दूषित पूर्वाग्रहों से मुक्त करती है। इसीलिए इस महत्वपूर्ण संस्कार का नाम विद्यारम्भ रखा गया, शिक्षारम्भ नहीं।
गुरु का भारतीय जीवन पद्धति में और भी अनेक कारणों से महत्व है। सबसे पहली बात तो यह कि न केवल शिक्षा अपितु समाज जीवन के हर क्षेत्र में गुरु की आवश्यकता बताई गयी है। मां अपने बच्चों की प्रथम गुरु कही जाती है। क्योंकि वही उन्हें चलना, बोलना और किस से क्या व्यवहार करना, यह बताती है। बालिकाओं को मां और बालकों को प्राय: पिता भावी जीवन के लिए तैयार करते हैं। इसलिए बच्चे का पहला विद्यालय उसका घर है, यह कहा जाता है।
इस घर के बाद किताबी ज्ञान के लिए बच्चा घर से कुछ दूर के विद्यालय में अध्यापक के निर्देशन में शिक्षा पाता है। भारतीय परम्परा में शिक्षा समाप्ति के बाद दीक्षा का भी बड़ा महत्व है। दीक्षा से ही शिक्षित युवा यह जान पाता है कि उसे शिक्षा का उपयोग किस दिशा में करना है। दीक्षा के अभाव में शिक्षा का कैसा दुरुपयोग होता है, इसके हर दिन सैकड़ों उदाहरण हम देखते हैं। बंदूक चलाने की शिक्षा के बाद यदि दीक्षा न हो, तो वह किसी निरपराध की हत्या भी करा सकती है। जबकि सही दीक्षा हो, तो उससे देश की रक्षा की जा सकती है। इसलिए शिक्षा के बराबर ही दीक्षा का भी महत्व है।
केवल किताबी ज्ञान ही क्यों, सब प्रकार के जीवनोपयोगी व्यवहारिक कार्य भी गुरु के निर्देशन में ही तो सीखे जा सकते हैं। सच तो यह है कि जीवन का चाहे कोई भी क्षेत्र हो, गुरु के सान्निध्य के बिना उद्धार संभव नहीं है। इसीलिए जब दशरथ के दरबार में विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को मांगने आये, तो वे संकोच में पड़ गये। ऐसे में गुरु वशिष्ठ ने राजा को आश्वस्त किया, क्योंकि वे जानते थे कि राम का अवतार जिस काम के लिए हुआ है, उसके लिए उन्हें विश्वामित्र जैसे गुरु का सान्निध्य मिलना आवश्यक है।
कौरव और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य और कर्ण के गुरु परशुराम की कहानी कौन नहीं जानता ? शिवाजी के जीवन में परिवर्तन तब ही हुआ, जब उन्हें समर्थ स्वामी रामदास जैसा श्रेष्ठ गुरु मिला। विजयनगर साम्राज्य के निर्माता हरिहर और बुक्क के जीवन में स्वामी विद्यारण्य ने परिवर्तन किया। बन्दा बैरागी की जीवन को सही दिशा गुरु गोविंद सिंह ने दी। रामकृष्ण परमहंस के कारण विवेकानंद का; विवेकानंद के कारण मार्गरेट नोबेल (भगिनी निवेदिता) का और स्वामी विरजानंद के कारण ऋषि दयानंद का जीवन बदल गया। वीर सावरकर और श्यामजी कृष्ण वर्मा ने न जाने कितने युवकों के मन में क्रांति का बीज बोया। गुरु शिष्य के अन्तर्मन में छिपी प्रतिभा को पहचान कर उसे पल्लवित, पुष्पित और प्रस्फुटित होने का अवसर प्रदान करता है। वह शिष्य की कमियों को प्रेम से दूर करता है और फिर उसे अपने से भी आगे बढ़ता देखकर प्रसन्न होता है।
गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़-गढ़ काढ़े खोट
अंदर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट।।
पश्चिमी चिंतन में गुरु का इतना महत्व नहीं है। वहां शिक्षक और छात्र तो हैं; पर गुरु और शिष्य नहीं। वहां शिक्षा तो है; पर विद्या और दीक्षा नहीं। शिक्षक अपने परिवार का पेट भरने के लिए पढ़ाता है और छात्र भी इसीलिए पढ़ता है कि वह भविष्य में परिवार पाल सके। इसी में से वेतन, ट्यूशन, नकल, नंबर बढ़ाने और हिंसक आंदोलन जैसी प्रवृत्तियां जन्मी हैं, जिन्होंने शिक्षा जगत का कबाड़ा कर दिया है। इसीलिए अब शिक्षक छात्रों से डरते हैं। विद्यालय नग्नता, गुंडागर्दी, दलाली और राजनीति के अड्डे बन गये हैं। यदि इस दृश्य को बदलना है, तो गुरु परम्परा को पुनर्जीवित करना होगा।
आज गुरुपूर्णिमा के इस पावन पर्व पर हमें अपने कर्तव्यों का स्मरण होना चाहिए; पर ये कर्तव्य निरी बातों से नहीं,अपितु अपने चरित्र और व्यवहार से पूरे होंगें। हमारे पूर्वजों ने हमें स्मरण भी कराया है ---
एतद्देश प्रसूतस्य, सकाशादग्रजन्मन: ।
स्वं स्वं चरित्रन् शिक्षेरन, पृथिव्य: सर्वमानव:।। (मनुस्मृति)
गुरु की महिमा अपार है। इसका न वर्णन संभव है और न लेखन। यह शब्दातीत है। गुरु की वाणी ही नहीं, उसका स्पर्श और दृष्टि ही व्यक्ति के जीवन को बदलने के लिए पर्याप्त है।सब धरती कागद करूं, लेखनी सब बनराय ।
सात समुद्र की मसि करूं, गुरु गुण लिखा न जाय।।
इसीलिए जब वाणी मौन हो जाती है और मस्तिष्क विचार शून्य; तब यही कह कर संतोष करना पड़ता है---गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वर: ।गुरु: साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नम:।।(स्कन्दपुराण (गुरु गीता))
गुरुपूर्णिमा का पर्व हमें यही याद दिलाने आया है।




10 टिप्पणियाँ:
बहुत सुंदर लेख जान कारियो से भरपुर.. आप को ओर सभी परिवार जनो को ओर सभी ब्लांग मित्रो को गुरुपूर्णिमा की बधाई ओर शुभकामान्ये
सम्यक आलेख ! गुरु पूर्णिमा विषयक जानकारी के लिए आपका कोटि कोटि अभिनन्दन ! ईश्वर से यही प्रार्थना है कि आप जैसे मनीषियों के आलेख बिगड़ती पीढ़ियों के काम आयें !
धन्यवाद! देखते हैं कि आज कितने बाबा अपने पैर पुजाने के कार्यक्रम से अवकाश लेकर आज का एक दिन अपने गुरु परम्ब्रह्म को समर्पित करते हैं!
प्रणाम गुरू जी/ आप शायद सोचें कि आज मैने आपको पंडीत जी की बजाय गुरू शब्द से क्यों संबोंधित किया/ गुरू जी विगत एक डेढ वर्ष से आपके द्वारा लिखे गए प्रत्येक आलेख को मैं पढता आया हूँ/जिन्हे पढकर आपके व्यक्तित्व/अपकी विद्वता को स्पष्ट रूप से मैने जाना है/ उन लेखों के जरिए आपसे मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला है/इसलिए मैने आपको गुरू कहा है/अशा करता हूं आप मेरे मन की भावना को समझेंगें/
प्रणाम/
प्रणाम गुरू जी/ आप शायद सोचें कि आज मैने आपको पंडीत जी की बजाय गुरू शब्द से क्यों संबोंधित किया/ गुरू जी विगत एक डेढ वर्ष से आपके द्वारा लिखे गए प्रत्येक आलेख को मैं पढता आया हूँ/जिन्हे पढकर आपके व्यक्तित्व/अपकी विद्वता को स्पष्ट रूप से मैने जाना है/ उन लेखों के जरिए आपसे मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला है/इसलिए मैने आपको गुरू कहा है/अशा करता हूं आप मेरे मन की भावना को समझेंगें/
प्रणाम/
गुरु पूर्णिमा विषयक जानकारी के लिए आपका कोटि कोटि अभिनन्दन !
बहुत बढिया जानकारीपरक आलेख. आपको भी गुरूपूर्णिमा की बहुत बहुत बधाई!
गुरु पूर्णिमा की हार्दिक बधाई
हमारीवाणी का लोगो अपने ब्लाग पर लगाकर अपनी पोस्ट हमारीवाणी पर तुरंत प्रदर्शित करें
हमारीवाणी एक निश्चित समय के अंतराल पर ब्लाग की फीड के द्वारा पुरानी पोस्ट का नवीनीकरण तथा नई पोस्ट प्रदर्शित करता रहता है. परन्तु इस प्रक्रिया में कुछ समय लग सकता है. हमारीवाणी में आपका ब्लाग शामिल है तो आप स्वयं हमारीवाणी पर अपनी ब्लागपोस्ट तुरन्त प्रदर्शित कर सकते हैं.
इसके लिये आपको नीचे दिए गए लिंक पर जा कर दिया गया कोड अपने ब्लॉग पर लगाना होगा. इसके उपरांत आपके ब्लॉग पर हमारीवाणी का लोगो दिखाई देने लगेगा, जैसे ही आप लोगो पर चटका (click) लगाएंगे, वैसे ही आपके ब्लॉग की फीड हमारीवाणी पर अपडेट हो जाएगी.
कोड के लिए यंहा क्लिक करे
@ बन्धु कृ्ष्ण गोपाल(कृ्ष्ण) जी,
अपके प्रेम एवं स्नेह से अभिभूत हैं...आपकी भावनाओं का सम्मान करता हूँ. किन्तु आपसे एक आग्रह है कि कृ्प्या आप मुझ नाचीज के लिए "गुरू" जैसे इस परम पवित्र संबोधन का प्रयोग न करें. भाई मुझ में न तो इतनी सामर्थ्य है और न ही काबिलियत कि मैं इस महानतम शब्द का भार वहन कर पाऊँ. ये आपका स्नेह और प्रेम ही है जो कि मुझ जैसे निर्गुणी व्यक्ति में भी आप गुरूता खोज रहे हैं....
इसे आप मेरा आग्रह/निवेदन/प्रार्थना/विनती कुछ भी समझ लीजिए कि कृ्प्या भविष्य में पंडीत जी, शर्मा जी, दिनेश जी या वत्स जी इत्यादि चाहे जिस मर्जी संबोधन का प्रयोग करें किन्तु "गुरू" जैसे संबोधन से नहीं.....मैं आप सब स्नेही जनों से सिर्फ स्नेह एवं सम्मान की ही आशा करता हूँ.. बस ये सदैव यूँ ही बना रहे.
ईश्वर आपका कल्याण करे....
एक टिप्पणी भेजें