हम आधुनिक युग में जी रहे हैं, इस युग के लिए फालतू की ये वैदिक बातें अनुरूप नहीं. दुनिया कहाँ से कहाँ बढती चली जा रही और हम इन पुरातनपंथी दकियानूसी बातों में उलझे हैं----- ब्लागजगत में अक्सर इस प्रकार की बातें सुनने को मिलती ही रहती है. यह ठीक है कि हमें आगे बढना है. यह बढना व्यापार भौतिकता को लेकर ही होता है. बाहरी बढाव को देखकर हम भी सोचते हैं कि हमें भी आगे बढना है. बढें! जरूर बढें बल्कि जीवन का तो दूसरा नाम ही बढना है. बाकी दुनिया के साथ बढने को तो रोका भी नहीं जा सकता. लेकिन इस बढने में शान्ती नहीं मिलेगी. अशान्त रहकर बढते रहना भी तो अच्छा नहीं. इस यान्त्रिक युग में रहकर भी शान्त रहने के उपाय जो हमारे पास विद्यमान हैं. इसके लिए प्रयाप्त सामग्री को जुटाकर चिरन्तन रखे हुए है-----उनको भला हम क्यों छोडें ? वे आजकल के यान्त्रिक आविष्कारों के लिए प्रतिबंधक तो नहीं हैं. हम अपनी संस्कृ्ति का अवलम्बन करते हुए युगानुरूप नूतन आविष्कारों में क्यूँ नहीं लग सकते. इनमें कौन सा किसी प्रकार का बाधक बाध्य भाव है. अपनी संस्कृ्ति में रहकर भी तो हम वैज्ञानिक आविष्कारों में बुद्धि लगा सकते हैं. विज्ञान के साथ आगे बढते हुए हम ऎसी बातों को तो वर्जित कर ही सकते हैं, जो कि बिना उनके परिणाम पर विचार किए पश्चिमी समाज का निरा अन्धानुकरण मात्र है. पश्चिमी समाज यदि वैसा करता है तो क्या ये जरूरी है कि हमें भी ऎसा ही करना चाहिए. हम अनुकर्ता क्यों बनें ? क्या हमारे पास अनुकार्य बनने की सामर्थ्य नहीं है?. आत्मीयता के रहते हुए परकीयता को ग्रहण क्यों करें ?.

आज इस युग में इन संस्कारों को क्यों मानें ?.इस प्रश्न के उत्तर में हम अपने संस्कारों का भला क्यों परित्याग करें कहने पर क्या समाधान होगा ? कह सकते हैं कि ये सब एक फैशन बन चुका है. फैशन ही तो अनुकरण है और अनुकरण करने वाला तो परतन्त्र ही होता है, जब कि अनुकार्य स्वतन्त्र. यूँ भी सदियों की परतन्त्रता के चलते अब परतन्त्रता तो हमारे खून में रम चुकी है..निकलने वाली नहीं...हर्गिज भी नहीं. इसके लिए तो शरीर का पूरा खून ही बदलना पडेगा........
10 टिप्पणियाँ:
बहुत बेहतरीन बात कही है आपने हम खुद विचार करें पहले व्यक्ति की आवश्यकता कितनी सी थी रोटी कपडा और मकान. आज के हिसाब से तो ये बिलकुल बाबा आदम के ज़माने की जीवन शैली है, लेकिन क्या हम दावा कर सकते है की उनकी तुलना में हम ज्यादा सुखि है. सिर्फ आज की चकाचौंध ही असल विकास है या संतोषी जीवनशैली में सुख से जीवन यापन करना . क्या हर चकाचौंध के पीछे गहरा अन्धकार नहीं है, क्या पा लिया है हमने साइंस के विकास से जबकि हमारी शांति ही खो गयी है.
@ अनुकरण करने वाला तो परतन्त्र ही होता है, जब कि अनुकार्य स्वतन्त्र.--------- सत्य घोष किया है आपने
धूल में मिला दिया आजादी के परवानो का बलिदान
भारत सम्राट झुक ले रहे आंग्ल-रानी से बेटन दान
आपकी चिंता स्वाभाविक है ! अत्यंत विचारपरक आलेख ! सुन्दर आलेख !
पंडित जी आपके विचारों से असहमत होने का तो कोई सवाल ही नहीं/ वास्तव में अपने देश, अपनी सभ्यता और अपनी संस्कृ्ति को सर्वोचता को स्वीकार करना ही सही मायनों में राष्ट्रीयता की आधारशिला है/
प्रणाम/
ओर हाँ पंडित जी आपसे एक विनती है कि कभी समय मिले तो भारतीय दर्शन तथा षोडश संस्कार पद्धति पर कुछ बढिया सी पोस्ट जरूर लिखें/ बहुत समय से इस बारे में कुछ अच्छा पढने को तलाश रहा हूँ/
आभार/
श्रीमान जी आपके विचार पढ़कर बहुत अच्छा लगा
लेकिन वर्तमान देश की स्थिति देखकर मन बहुत उदास हो जाता है। पर कर भी तो कुछ नहीं सकते?
बहुत सुंदर लिखा आप ने... लेकिन आज की पीढी इसे ही सच मान रही है जो पश्चिम का कुडा मात्र है.. ओर उसे अपने संस्कार ओर बाते बेकार लगती है, लेकिन कब तक....यह सब चलेगा? कभी तो लोट के आना होगा
waah! sir aapake vichar bahut umda lage. hakikat mein hamara samaaj kuch budhijivi type ke logon ka kaha hi sach maan baithta hai
एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं!
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