would like to thank you, for taking time to visit my blog

बुधवार, 14 जुलाई 2010

यात्रा----साकार से निराकार तक.....

सफर के दौरान कुछ लोगों की आदत होती है कि वो कोई न कोई पुस्तक/समाचार पत्र इत्यादि पढते रहते हैं.वैसे मैं स्वयं भी इसी आदत का शिकार हूँ. कुछ दिन पहले की बात है, ट्रेन में सफर के दौरान,अपने अनन्त अज्ञान में कमी करने की खातिर मैं 'ओशो' की एक पुस्तक पढ रहा था.मेरे बगल की सीट पर बैठे एक भाई को या तो कोई काम नहीं था या शायद उन्हे एक पंडित को देखकर अपनी कोई जिज्ञासा मिटाने की सूझी, बोले---
"आप.....शायद पंडित जी है"
"जी हाँ, जन्म से तो ब्राह्मण हूँ ही और कुछ अंशों में कर्म से भी"
"पंडित जी, आप कहें तो मैं आपसे एक सवाल पूछ सकता हूँ?"
"जी कहिए"
"मैं सिर्फ ये जानना चाहता हूँ कि भगवान साकार है या निराकार"
धर्म-चर्चा का पिटा पटाया प्रश्न.---" जी बात ये है कि यदि मैं अपनी बात कहूँ तो मैं तो निराकार ईश्वर का पुजारी हूँ, ओर जब मेरी आस्था उनके निराकार रूप में है तो फिर मैं तो उन्हे निराकार ही मानूँगा" मैनें उत्तर देकर बात खत्म करने का प्रयास किया.
"तो जो लोग मूर्ती पूजा करते हैं, वो ?
"भाई बात ये है कि ये मामला पूरी तरह से इन्सान की कल्पना से जुडा है, कुछ लोगों नें पहले एक साक्षात भगवान की कल्पना की, दुनिया नें कहा कि हमें दिखाओ तो तब वे बोले कि भगवान निराकार है. इस प्रकार भगवान की स्थापना भी हो गई और उसके दर्शन कराने से भी छुट्टी मिल गई"
यदि किसी बालक नें बचपन में कभी ईश्वर का नाम न सुना हो और आप उसे किसी साकार ईश्वर की कल्पना कराना चाहें तो उसके मन में अच्छा बुरा कुछ न कुछ चित्र तो बन ही जाएगा. किन्तु यदि आप उसे किसी निराकार ईश्वर की कल्पना कराना चाहें तो वह बेचारा क्या खाक समझेगा ? आप उसे समझाएं तो वो चार मुखों वाले ब्रह्मा को समझ सकता हैं, शेषनाग की शैय्या पर शयन करने वाले विष्णु को समझ सकता हैं ओर तो ओर जटाजूट धारी सर्पों की माला पहनें रहने वाले शंकर को भी आप समझा सकते हैं, किन्तु किसी निराकार ईश्वर को नहीं.
आप उन्हे गौसाईं तुलसीदास जी के उस ईश्वर का कैसे दर्शन करा सकते हैं, जिसके "पाँव" नहीं है लेकिन फिर भी चलता है, जिसके "कान" नहीं है किन्तु जो सबकुछ सुनता है, जिसके हाथ नहीं हैं किन्तु फिर भी नाना प्रकार के कर्म करता है. "पगु बिन चलै, सुनै बिन काना....कर बिन करम करै बिधि नाना"!!
"जी बात तो आपकी ठीक है. मैं मानता हूँ कि मैं तो ऎसी स्थिति में उन्हे निराकार ईश्वर की कुछ भी कल्पना नहीं करा सकता".......
बहुत पहले एक आलेख मैने कहीं पढा था---"ईश्वर शब्द का इतिहास", बहुत ही उपयोगी लेख था. जिसमें लेखक नें बताया है कि ईश्वर शब्द से जो कुछ आज हम ग्रहण करते हैं, उस शब्द को उस अर्थ का वाची होने में प्रयाप्त समय लगा. ईश्वर शब्द को अपने आज के 'सर्वज्ञ', 'सर्वशक्तिमान', 'सर्वान्तर्यामी.......' अर्थ का बोधक बनने में कदाचित कईं शताब्दियाँ लग गई. जो हो, मानव नें जैसे अपनी स्थूल कल्पना से एक दिन ब्रह्मा की रचना की थी, उसी प्रकार उसनें अपनी सूक्ष्म कल्पना से 'ब्रह्म' की भी कल्पना कर ही ली.
मैं इसे समाज का बडा भारी सौभाग्य मानता हूँ कि सारे के सारे देवता साकार से निराकार नहीं बन गए. यदि कहीं ऎसा हुआ होता तो न जाने साहित्य और कला की कितनी अपार हानि हुई होती. लोग अनेक ऎतिहासिक पुरूषों के जीवन चरित लिखते हैं, किन्तु ऎतिहासिक पुरूषों से भी अधिक जो देवी-देवता अनेक लोगों के मन में बसे हुए हैं, उनके भी जीवन चरित लिखने की बडी आवश्यकता है. आदमियों की तरह ही देवता गण भी पैदा होते ओर मरते हैं. इसमें संदेह नहीं कि उनकी आयु इन्सानों की तुलना में कहीं अधिक होती है. कोई कोई देवता तो युगों तक जिन्दा रहते हैं.आज वैदिक समाज के कितने देवता जीवित हैं? समाज के मानस नें उनकी मिट्टी से न जाने कितने नये देवताओं का निर्माण कर लिया है.
बंगाल में देवी सरस्वती और महाराष्ट्र में गणपति जी की मूर्तियों को कईं दिन की लगातार पूजा के बाद जल समाधि दे दी जाती है, बल्कि अब तो कईं सालों से ये मूर्तियों की जल समाधि प्रथा हमारे पंजाब में भी शुरू हो चुकी है. उस दिन मैं यूँ ही बैठे बैठे भगवान गणपति और देवी सरस्वती की मूर्तियों के गंगा लाभ तथा उनकी जल समाधि के अर्थशास्त्र पर विचार कर रहा था. बताईये भला अर्थ का कितना भारी अपव्यय किया जा रहा है!
उसी दिन की बात है, मैने यहाँ सतलुज नदी में एक मंडली द्वारा गणपति जी की मूर्ति का विसर्जन करते देखा. मूर्ति विसर्जित हो गई तो उस मंडली के लोग आनन्द विभोर होते अपने घरों को चल दिए.
मैं उनके आनन्द के उदगम स्थान को समझने की चेष्टा करने लगा तो मुझे इकबाल का एक शेर याद हो आया, जिसका आशय कुछ इस प्रकार है------"मैं अपने सम्पूर्ण आत्म चरित्र को एक पंक्ति में लिख सकता हूँ. मैने मूर्तियों को निर्माण किया, उनकी पूजा की ओर फिर उन्हे तोड डाला"
होता ये है कि, हम में से अधिकाँश भौतिक अथवा काल्पनिक मूर्तियों का निर्माण करते हैं, उनकी पूजा करते हैं किन्तु समय पर उन्हे तोड नहीं पाते. जिन्हे किसी भी प्रकार की मूर्तियों की सच्ची पूजा करनी हो तो उसे मूर्तियों का निर्माण ही नहीं उन्हे तोडना भी आना चाहिए. विकासोन्मुख मानव के लिए निरा मूर्ति पूजक ही होना प्रयाप्त नहीं है, उसे मूर्ति भंजक भी होना चाहिए................

12 टिप्पणियाँ:

ali ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
ali ने कहा…

अत्यंत चिंतन परक आलेख ! आज आपकी जितनी भी प्रशंसा करूँ कम होगी !

karishna ने कहा…

पंडीत जी आपकी विद्वता को नमन करता हूं/ क्या बेहतरीन चिन्तनपरक प्रस्तुति है/ हकीकत यही है कि आज लोग मूर्ति को ही भगवान समझने लगे हैं/
प्रणाम/

Sandeep Tyagi ने कहा…

आपके विचारों से सहमत

अमित शर्मा ने कहा…

लोगों में सगुन और निर्गुण उपासना के तात्पर्य को लेकर बड़ा मतभेद है। एक सामान्य सी परिभाषा लोगों के दिमाग में फिक्स है की परमात्मा को निर्गुण मानकर की जाने वाली उपासना निर्गुण उपासना है, और साकार मानकर की जाने वाली उपासना सगुन उपासना। पर शायद बारीकी से सोचा जाये तो सगुन-निर्गुण का मतलब कुछ और ही है। यदि उपास्य में ज्ञान,बाल,क्रिया,शक्ति,रूप आदि कुछ माना ही ना जाये तो फिर उसकी उपासना की कोई आवश्यकता ही नहीं है। ऐसी वस्तु का क्या ध्यान किया जाये ? ऐसी शुन्य-कल्प निर्गुण वास्तु का तो निर्देशन करना भी कठिन है। हकीकत में तो ऐसी कोई तत्व हो ही नहीं सकता जिसमें रूप,गुण आदि ना हो। हम लोगों ने निर्गुण- निराकार शब्दों को हाउ बना डाला है, और इन शब्दों के ऐसे कल्पित अर्थ कर डाले है की जनसामान्य की तो बुद्धि ही चकराने लगती है। इन शब्दों के वास्तविक अर्थ क्या है, इस बारे में तो शास्त्रों का ही सहारा लिया जाना चहिये।

निर् + गुण और निर् + आकार आदि समस्त पद है। व्याकरण शास्त्र के आचार्यो ने ऐसा नियम बताया है की ------ निर् आदि अव्यवों का पंचमी विभ्क्त्यंती शब्दों के साथ क्रांत (अतिक्रमण) आदि अर्थों में समास होता है।

इनका विग्रह (विश्लेषण) इस प्रकार किया जाता है------- निर्गतो गुणेभ्यो यः, स निर्गुणः, निर्गत आकारेभ्यो यः स निराकारः । मतलब जो सारे गुणों का अतिक्रमण कर जाये (प्रकृति के सत्व, रज, तम तीनो गुणों से लिप्त ना हो ) वही निर्गुण कहलाता है। इसी तरह पृथ्वी आदि समस्त आकारों को जो अतिक्रमण करने की सामर्थ्य रखता हो, अर्थात जिसका आकार अखिल ब्रह्माण्ड से भी बड़ा हो, वही निराकार कहलाता है। निर्विशेष, निर्विकल्प आदि दूसरे शब्दों का भी इसी तरह अर्थ होता है।

व्याकरण शास्त्र के इन शब्दों के उपर्युक्त अर्थ के समर्थक उदहारण भी है। जैसे-------- "निस्त्रिन्शः निर्गतः त्रिन्शेम्योsगुलिभ्यो यः स निस्त्रिन्शः" अर्थात तीस अंगुल से बड़े खड्ग (तलवार) को निस्त्रिंश कहना चहिये।

इसी तरह वेदादि शास्त्रों में भी परमात्मा का आकार भी समस्त आकारों से बड़ा बताया गया है जिसके एक एक रोम में करोड़ों ब्रह्माण्ड स्थित है।
"ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।"

"पगु बिन चलै, सुनै बिन काना....कर बिन करम करै बिधि नाना"!! का अर्थ भी इन्ही अर्थों में है........................


शास्त्रीय प्रमाणों से जब अर्थ का सामंजस्य हो जाता है, फिर ब्रह्म को सर्वथा गुण रहित और आकार रहित कैसे माना जाये ????

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

गजब के विचार, गजब की दलीलें।
………….
दिव्य शक्ति द्वारा उड़ने की कला।
किसने कहा पढ़े-लिखे ज़्यादा समझदार होते हैं?

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत सार्थक और विचारणीय पोस्ट है--- हमेशा की तरह। धन्यवाद और शुभकामनायें

Maria Mcclain ने कहा…

You have a very good blog that the main thing a lot of interesting and beautiful! hope u go for this website to increase visitor.

कुमार राधारमण ने कहा…

बहुत प्रासंगिक पोस्ट। हमारे मनीषियों ने भी इस पर बहुत प्रकाश डाला है मगर बहुधा इस बारे में कही गई मौलिक बातें लोगों के हृदय में कम घर कर पाई हैं। जब तक अंतर्यात्रा शुरु न हो,साकार-निराकार का फर्क समझ में नहीं आता।

Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…

गहन विवेचन!!! वास्तव में साकार और निराकार दोनों ही इश्वर के रूप हैं. आम जन निराकार रूप की अपेक्षा साकार रूप को अपने मन-मस्तिस्क में आसानी से बिठा पाता है. वास्तव में साकार-निराकार विवाद ही व्यर्थ है.

Divya ने कहा…

@...विकासोन्मुख मानव के लिए निरा मूर्ति पूजक ही होना प्रयाप्त नहीं है, उसे मूर्ति भंजक भी होना चाहिए....

Bahut sahi baat rakhi aapne !

Vicharon ko naya aayaam deti ek behetreen post !

राज भाटिय़ा ने कहा…

वाह पंडित जी बहुत खुब, अकसर मुझे यहां मेरे जर्मन मित्र ओर पकिस्तानी मित्र पुछते है कि तुम लोग पत्थर की मुर्ति क्यो पुजते हो? क्या वह तुम्हारा भगवान है, तो मै यही कहता हुं नही वो तो एक आम पत्थर है, तो फ़िर उसे क्यो पुजते हो?? तो मै उन से यही पुछता था कि अप के पास आप के परिवार की कोई फ़ोटो हो तो दिखाओ, ओर वो सारी एलबम ही ऊठा लाते, ओर मजे से बताते कि यह मेरी मां है यह मेरे पिता है यह मेरी बीबी है... वगेरा वगेरा.. तो अंत मै मै यही कहता कि नही यह तो सिर्फ़ एक कागज है जिस पर यह सब चित्र अकिंत है जिन्हे तुम अपना कह रहे हो, तुम सिर्फ़ उस चित्र को अपना कह रहे हो इस कागज से तुम्हे कोई मतलब नही, इसी प्रकार हमारे बुजुर्गो ने हमे समझाने के लिये पत्थर पर कोई आक्रित आंकित कर दी... जब कि भगवान ऎसा नही है, ओर आज आप का लेख पढ कर मुझे बहुत अच्छा लगा, ओर यह सच भी है.
आप का धन्यवाद

LinkWithin

Related Posts Widget for Blogs by LinkWithin

Blog Stats

Submit