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बृहस्पतिवार, 1 जुलाई 2010

कहीं अपनी अपनी हाँकने का नाम ही तो जीवन नहीं ???

मेरे साथ ये अक्सर ऎसा होता है, कि, जब भी कभी जीवन जी नहीं रहा होता हूँ तो यूँ ही इस के बारे में सोचने लगता हूँ और जब यह सोच के बाहर होने लगता है बैठे ठाले इसे पकडने की नाकाम सी कौशिश में कुछ लिखने लगता हूं.
जीवन क्या है ?----इसे सब अपने अपने तौर पर और अपनी अपनी भाषा में जब जानने की गवाही देने लगते हैं तो महसूस करने लगता हूँ---कि, काश! मैं भी जान पाता.
कुछ समय पहले तक शायद मैं भी मन से तो इसके बारे में जानता था,पुराणों-उपनिषदों की भाषा में बहस किया करता था, मन्त्र-पूजा-पाठ,नाम-जाप आदि में इसकी बात किया करता था; योग के साधनों से इसे कुछ हद तक महसूस भी करने लगा था. साधना चूँकि न सहज थी और न ही असहज,इसलिए शायद यह मेरी पकड से कहीं बाहर हो गया. अब मन से सोचना अधूरा लगता है. दिमाग से सोचना ही आवश्यक हो गया. मेरे आसपास के कुछ लोग जब अपनी भाषा में इसे जानने,समझने और पहचानने का दावा करते हैं तो मुझे उदास होकर सोचना पडता है-----काश मैं भी इन की तरह पहुँचा हुआ होता. इस के बारे में सब तरह के कथनों को सुनता रहता हूँ, भारी भरकम ग्रन्थों पर भी नजर डालता रहता हूँ, लेकिन निश्चित रूप से इसे पाने से वंचित रह जाता हूँ.
कभी पहले के युग में इसे ब्रह्म कहा जाता था, आज विज्ञान नें इसकी कोई ओर नई परिभाषा गढ डाली है,वो शायद इसे कुछ ओर कहने लगा है. अब कौन सही है,कौन गलत ?----इसका पता भी कहाँ चलता है. मन से सोचने वाले अपनी हाँकते हैं,शरीर से मानने वाले अपनी और इन सब से इतर आत्मा कुछ ओर ही कहती है. राम जाने ये जीवन भी क्या बला है. सोचता हूँ कि कहीं अपनी अपनी हाँकने का नाम ही तो जीवन नहीं ???

13 टिप्पणियाँ:

आचार्य जी ने कहा…

सार्थक अभिव्यक्ति।

माधव ने कहा…

nice

ali ने कहा…

@ दिनेश भाई
महाराज किसी पहुंचे हुए की तरह पहुंचा हुआ बनने की मत सोचिये यह गलत लाइन है!
विश्वास कीजिये आप जैसे हैं ,बहुत बेहतर हैं !

राज भाटिय़ा ने कहा…

आज तक हम भी नही समझ सके जी, धन्यवाद इस सुंदर लेख के लिये

Udan Tashtari ने कहा…

कौन जान पाया है जीवन क्या है!!

और अब तो भौतिकवादी दुनिया में यह सोचने की किसी को फुरसत भी नहीं है.

सही विषय मंथन किया.

महफूज़ अली ने कहा…

कौन जान पाया है जीवन क्या है!!

और अब तो भौतिकवादी दुनिया में यह सोचने की किसी को फुरसत भी नहीं है.

सही विषय मंथन किया.

अमित शर्मा ने कहा…

सही विषय मंथन किया............ईश्वर शायद गढ़ने की चीज नहीं है , लोगों ने अपने अपने ईश्वर गढ़ लिए है शायद इसीलिए इतना झगडा फैला है ......... ईश्वर को तो शास्त्र प्रमाण से ही अनुभूत किया जा सकता है ......................

http://27amit.blogspot.com/2010/04/blog-post_15.html

अमित शर्मा ने कहा…

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा //
http://27amit.blogspot.com/2010/04/blog-post_15.html

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

शायद आप सही कह रहे हैं!

ललित शर्मा ने कहा…

बस पहुंच गए महाराज

जय हो

आपकी पोस्ट ब्लाग4वार्ता में

विद्यार्थियों को मस्ती से पढाएं-बचपन बचाएं-बचपन बचाएं

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

सार्थक अभिव्यक्ति! वस्तुतः मन ही है किसी चीज की व्याख्या कैसे करता है? और अपना अनुभव्।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

जीवन तो पहेली है...बूझते जाइये, शायद उत्तर मिल जाये..

shikha varshney ने कहा…

अगर जीवन पहेली ही भूझ ले कोई तो फिर क्या है...सार्थक अभिव्यक्ति

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