1. आनन्द के लिए = संगीत
2. खाने के लिए = गम
3. पीने के लिए = क्रोध
4. निगलने के लिए = अपमान
5. व्यवहार के लिए = नीति
6. लेने के लिए = ज्ञान
7. देने के लिए = दान
8. जीतने के लिए = प्रेम
9. धारणे के लिए = धैर्य
10. तृ्प्ति के लिए = संतोष
11. त्यागने के लिए = लोभ
12. करने के लिए = सेवा
13. प्राप्त करने के लिए = यश
14. फैंकने के लिए = ईर्ष्या
15. छोडने के लिए = मोह
16. रखने के लिए = इज्जत
17. बोलने के लिए = सत्य



17 टिप्पणियाँ:
वाह्! पंडीत जी आज तो ब्लाग पे मानो ज्ञान की गंगा बह रही है/ये तो जीवन के स्वर्णिम सूत्र हैं/
प्रणाम/
वाह्! पंडीत जी आज तो ब्लाग पे मानो ज्ञान की गंगा बह रही है/ये तो जीवन के स्वर्णिम सूत्र हैं/
प्रणाम/
मित्र चौथे में थोड़ी सी दिक्कत है बाक़ी सब निबाह रहे हैं !
सार्थक सूत्र
Jiwanopayodi sutra....
Prastuti hetu bahut shubhkamnayne
jay ho
वाह, पांडित्यपूर्ण -एक और जोडिये ,पढने के लिए ब्लॉग!
Wah, par fir aam admi ke liye jindagee kahan rahee ?
@मिश्रा जी, ये सूत्र ब्लागर के लिए नहीं बल्कि इन्सान के लिए है. हिन्दी के ब्लागरों के लिए तो नए सूत्र रचने पडेंगें..स्पैशल वाले :)
संग्रहणीय और मार्गदर्शक सूत्र.
आभार.
सबसे बड़ा आधार है लिंग और योनि , इसी से जीवन चलता है . क्यों ?
हमारा भारत महान है क्योंकि यहाँ उस चीज़ की पूजा होती है जिस पर पुरुष की महानता टिकी होती है . http://vedquran.blogspot.com/2010/07/way-for-mankind-anwer-jamal.html?showComment=1280147480789#c4309971045506993147
संग्रहणीय और मार्गदर्शक सूत्र.
आभार.
ab to jnaab aapke faarmule pr chne ki koshihs krna hi pdhegi . akhtar khan akela kota rajsthan
एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं!
आपकी चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं!
Bahut sundar...
बुरे संस्कारों को विकार कहा जाता है. जो जडता की ओर ले जाए सो विकार. जो भीतर के विकारों को मिटा
दे वो संस्कार. संस्कार माने सँवारना, सुधारना. जैसे-----दर्पण को स्वच्छ ..@ पंडित जी अन्यथा न लें ।
संस्कार का अर्थ । सन यानी से या उसके द्वारा और कार यानी करना । अच्छे बुरे दोनों संस्कार
आत्म ग्यान की दृष्टि से बाधक है । कबीर ने कहा । चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय । दो
पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय । ये दो पाट पाप और पुण्य के हैं । भक्ति द्वारा दोनों प्रकार
के संस्कार या जिसको आत्म ग्यान की भाषा में कारण बीज कहा जाता है । इन्हीं को जलाया जाता
है । ताकि ये फ़िर अंकुरित होकर जन्म लेने का कारण न बने । और यही सच्चे अर्थों में मुक्त होना
या खुद को जानना है । ..@ संस्कार माने सँवारना, सुधारना..आप बारीकी से निरीक्षण करना ये संस्कार
नहीं विवेक या प्रग्या बुद्धि से होता है । आपने ( श्री विनय शर्मा के लेख से ..जाना ) कहीं लिखा है ।
अंतकरण में गुरु होता है ..? ये बात भी गलत है । आप फ़िर से देखना । आंतरिक गुरु होता है ।
अंतकरण में नहीं । इसी अंतकरण में फ़ंसे होने के कारण जीव ( केवल मनुष्य़ ) खुद को नही
जान पाता । मन बुद्धि चित्त अहम । इन चार से अंतकरण बनता है । और इन चारों को एक में
समायोजित करने पर सुरति बन जाती है । और सुरति के ऊपर उठते ही मनुष्य के लिये अदृष्य सत्ता
और प्रकृति के रहस्य उसी तरह देखे जा सकते हैं । जैसे किसी ऊंची इमारत पर चडकर आराम से
शहर को देख सकते हैं । satguru-satykikhoj.blogspot.com
बुरे संस्कारों को विकार कहा जाता है. जो जडता की ओर ले जाए सो विकार. जो भीतर के विकारों को मिटा
दे वो संस्कार. संस्कार माने सँवारना, सुधारना. जैसे-----दर्पण को स्वच्छ ..@ पंडित जी अन्यथा न लें ।
संस्कार का अर्थ । सन यानी से या उसके द्वारा और कार यानी करना । अच्छे बुरे दोनों संस्कार
आत्म ग्यान की दृष्टि से बाधक है । कबीर ने कहा । चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय । दो
पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय । ये दो पाट पाप और पुण्य के हैं । भक्ति द्वारा दोनों प्रकार
के संस्कार या जिसको आत्म ग्यान की भाषा में कारण बीज कहा जाता है । इन्हीं को जलाया जाता
है । ताकि ये फ़िर अंकुरित होकर जन्म लेने का कारण न बने । और यही सच्चे अर्थों में मुक्त होना
या खुद को जानना है । ..@ संस्कार माने सँवारना, सुधारना..आप बारीकी से निरीक्षण करना ये संस्कार
नहीं विवेक या प्रग्या बुद्धि से होता है । आपने ( श्री विनय शर्मा के लेख से ..जाना ) कहीं लिखा है ।
अंतकरण में गुरु होता है ..? ये बात भी गलत है । आप फ़िर से देखना । आंतरिक गुरु होता है ।
अंतकरण में नहीं । इसी अंतकरण में फ़ंसे होने के कारण जीव ( केवल मनुष्य़ ) खुद को नही
जान पाता । मन बुद्धि चित्त अहम । इन चार से अंतकरण बनता है । और इन चारों को एक में
समायोजित करने पर सुरति बन जाती है । और सुरति के ऊपर उठते ही मनुष्य के लिये अदृष्य सत्ता
और प्रकृति के रहस्य उसी तरह देखे जा सकते हैं । जैसे किसी ऊंची इमारत पर चडकर आराम से
शहर को देख सकते हैं । satguru-satykikhoj.blogspot.com
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