समूचे विश्व में एक ये भारतीय संस्कृ्ति ही है, जिसका कभी ज्ञान से विरोध नहीं रहा. इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि अत्यन्त क्रान्तिकारी मत रखने वाले व्यक्ति का भी यहाँ आदर होता आया है. उसका मत सुना जाता था. यह देखा जाता था कि उस मत के पीछे कितनी विकलता, कितनी व्यापकता, कितना अनुभव, कितना चिन्तन है. यह भी देखा जाता था कि उस मत के लिए मतस्थापक कितना त्याग करने के लिए तैयार है. यह बात भी नहीं कि भारतीय संस्कृ्ति प्रत्येक ऎरे गैरे मत को बहुत शीघ्रता से अंगीकार कर लेती थी, उसे अपना लेती थी. बल्कि उस मत को अपने आपको सिद्ध करने का मौका दिया जाता था. यदि उसमें सत्य होगा तो वह स्वयं ही काल के प्रवाह में टिक सकेगा अन्यथा यूँ ही समाज के कदमों तले दबकर नष्ट-भ्रष्ट हो जाएगा.
भारतीय संस्कृ्ति में कहा गया है कि परमेश्वर का स्वरूप ही मूलत: ज्ञान है. ब्रह्म की व्याख्या क्या है? "ज्ञान ब्रह्म"
ज्ञान का अर्थ ही है ब्रह्म. ईश्वर की इससे बडी व्याख्या आपको संसार की किसी भी संस्कृ्ति में भी नहीं मिल सकती. ज्ञान की उपासना करना ही मानो ईश्वर की उपासना करना है. अनन्त रूपों में ज्ञान की उपासना. चाहे समाज शास्त्र हो, खगोल शास्त्र हो, भूगोल हो, इतिहास हो, आयुर्वेद हो, तत्वज्ञान हो, योग हो, कर्म-योग हो, गणित हो, संगीत हो, ज्योतिष हो...ये सब ज्ञानरूपी परमेश्वर की पूजा ही हैं. एक ही ज्ञान सूर्य की ये अनन्त किरणें हैं. महाभारत के श्लोक की भान्ती ही गणित की प्रश्नमाला भी उतनी ही पूज्य है. श्रुति-स्मृ्ति के अध्ययन के बराबर ही सृ्ष्टिशास्त्र का अध्ययन भी वैसा ही पवित्र है. सनातन धर्म की इस महान दृ्ष्टि को हमें फिर से अपनाना होगा. परमोच्च बौद्धिक विकास की परम ज्वाला हमें फिर से प्रज्वलित करनी होगी.
आज धर्म और संस्कृ्ति के स्वयंभू ठेकेदार टाईप के कुछ लोग संस्कृ्ति रक्षा की चिल्लाचोट मचाए फिरते हैं. इस भय से कि कहीं पश्चिम की ओर से आती नवीन विचारों की आन्धी हमें बहा कर न ले जाए. इसी भय से वो लोग बडी बडी दीवारें खडी करने में जुटे हैं. लेकिन मेरी नजर ये लोग संस्कृ्ति रक्षक नहीं बल्कि एक तरह से संस्कृ्ति को हानि पहुँचाने का ही काम कर रहे हैं. ये भारतीय संस्कृ्ति का शव अपने गले से चिपकाए रखना चाहते हैं, जब कि उसके अन्दर के प्राणों को अपने ही हाथों घोंटे दे रहे हैं.
"सनातनो नित्य नूतन:" जो नित्य नूतन स्वरूप धारण कर सकता है, सिर्फ वही टिकेगा. जिस पेड में नईं पतियाँ नहीं निकलती उसे मरणासन्न ही समझना चाहिए. ओर उसका मर जाना ही अच्छा है.
क्या संस्कृ्ति ठेकेदारों को यह भय है कि भारतीय संस्कृ्ति की भव्य इमारत नवीन विचारों से ढह जाएगी ? यदि वह इन विचारों की आँधी को सह ही न पाए तो फिर इसे टिकाए रखने से भी भला क्या लाभ ? क्या भारतीय संस्कृ्ति इतनी कच्ची है? हमारी दृ्ष्टि में तो वो ऎसी नहीं है. जिस संस्कृ्ति की नींव ज्ञान और अनुभव के ऊपर खडी की गई है तो फिर उसे किस बात का भय? वह ऊँची ऊँची दीवारें खडी करके, बुरका पहनकर नहीं बैठ सकती. भारतीय संस्कृ्ति को इस बुरके वाली निस्तेज पवित्रता की आवश्यकता नहीं.
भारतीय संस्कृ्ति में भय, नाश, मृ्त्यु आदि शब्दों का कोई स्थान नहीं. क्यों कि ज्ञान का कभी नाश नहीं होता और ज्ञान के आधार पर ही तो ये संस्कृ्ति खडी है. बस जरूरत है तो सिर्फ उस ज्ञान को ग्रहण करने की, उसे समाज के सामने लाने की.......न कि ठेकेदार बन संस्कृ्ति रक्षा का गदर्भ अलाप करने की.



15 टिप्पणियाँ:
पंडित जी बहुत सुन्दर आलेख. मुझे पसंद आया.
आँखें खोलने वाला और विचारणीय आलेख. जहां अज्ञान है वहां नाश का भय है ज्ञान के प्रकाश में कैसा भय?
यत्र योगेश्वरो कृष्णो यत्र पार्थो धनंजयः।
तत्र श्रीविजयोर्भूतिर्ध्रुवानीतिर्मतिर्मम।।
बस जरूरत है तो सिर्फ उस ज्ञान को ग्रहण करने की, उसे समाज के सामने लाने की.......न कि ठेकेदार बन संस्कृ्ति रक्षा का गदर्भ अलाप करने की.
-बिल्कुल सही!! सारगर्भित एवं विचारणीय आलेख.
बस जरूरत है तो सिर्फ उस ज्ञान को ग्रहण करने की, उसे समाज के सामने लाने की.......न कि ठेकेदार बन संस्कृ्ति रक्षा का गदर्भ अलाप करने की.
-विचारणीय एवं सारगर्भित आलेख!!
बहुत सुन्दर, विचारणीय एवं सारगर्भित आलेख.
पंडीत जी सच में बहुत उम्दा आलेख/ भारतीय संस्कृ्ति का युगों का इतिहास इस बात का साक्षी है कि इसमें अज्ञान, भय, नाश जैसे तत्वों का कोई स्थान नहीं/ आज जरूरत है संस्कृ्ति का मर्म समझने की न कि इस बहती धारा के मार्ग में अवरोध पैदा करने की/
प्रणाम!
mere blog par aane ka bahut-bahut shukriya...aapke blog par bahut kuch sikhne aur janne ko hai...dhanywad aapko mujhe yahan tak pahuchane ke liye.
बहुत खुब पंडित जी आप से सहमत हुं जी, बहुत अच्छी बाते बताई आप ने
सहमत
सुन्दर एवं प्रेरक आलेख।
"सनातनो नित्य नूतन:" स्वीकार्य ,पूर्णत:सहमत !
यत्र योगेश्वरो कृष्णो यत्र पार्थो धनंजयः।
तत्र श्रीविजयोर्भूतिर्ध्रुवानीतिर्मतिर्मम।।
पन्डित जी,
ब्रह्म ज्ञान तो परम सत्य होता हैं,और परम सत्य पुरे अनुसन्धान के बाद अन्तिम सत्य रूप होता है,फ़िर उसमें नवीन विचारों के लिये स्थान ही कहां?
ज्ञान से संसकृति भिन्न है,और अन्य विचार्धाराओं का प्रभाव संसकृति पर पडना अवश्यम्भावी है,वैदिक संसकृति का आज का स्वरूप उनही प्रभावों का परिणाम है। जैसे सादगी की जगह दिखावा,आडम्बर। भावयुक्त चरित्र की जगह कर्मकांड आदि। सुविधा योग्य उदार गंगा-जमुनी संसकृति का निर्माण तो सम्भव है,पर परम सत्य और संसकृति में विरोधाभास नजर आने लगता है। परम ज्ञान कहीं खो जाता है।
achha likha hai.
"सनातनो नित्य नूतन:" जो नित्य नूतन स्वरूप धारण कर सकता है, सिर्फ वही टिकेगा.
Sab kuchh keh diya aapne.
Wonderful post !
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