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बृहस्पतिवार, 20 मई 2010

नियति की ये अबूझ पहेली..............

जीवन पथ पर चलते चलते एक समय ऎसा भी आता है जब प्रत्येक व्यक्ति को ये सत्य स्वीकार करना ही पडता है कि नियति कि धूर्त आँखे हमारी हर दुर्बलता को बहुत अच्छे से पहचानती हैं। जब वे देखती हैं कि हमने अपने मन को इस अपूर्ण संसार के भी अनुकूल ढाल लिया है,तो हमें यहाँ से चलने का हुक्म सुना दिया जाता है----ऎसा हुक्म,जिसे टालने की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।
असल में इस नियति नें हम सब को तंग तो बहुत किया हुआ है,लेकिन ऎसा नहीं लगता कि इसे हमसे कोई खास द्वेष है। अगर यह विश्वास हो जाता कि यह द्वेषवश ही हमें इतने कष्ट दे रही है,तो हम बहुत पहले ही इसके इस खेल में हिस्सा बँटाने से इन्कार कर चुके होते। पर अब तो केवल इतना ही अनुभव होता है कि बिना किसी राग-द्वेष के,बिना हमारे किसी सुख या दुख की परवाह के वह अपना खेल खेले जा रही है। उसका मन हो तो पल में राजा बना दे,मन हो तो पल में भिखारी बना कर सडक पर खडा कर दे। और मुझे लगता है कि इसके सिवाए ओर कोई कारण नहीं है कि एक शैतान बच्चे को उस समय वैसा ही खेल खेलना और देखना अच्छा लगता है।
यह जो एक विराट खेल चल रहा है,उसमें हमारी स्थिति बहुत गौण और दयनीय है। बिल्कुल शतरंज के मोहरों के जैसे---जहाँ खेल खेलने वालों की इच्छाओं के हम सिर्फ साधन मात्र हैं। इस बात का ज्ञान उसे भी है,जो ये खेल खेल रहा हैं। और उसे यह भी पता है कि यदि हम यहाँ केवल कष्ट ही कष्ट पाते रहे तो बहुत जल्द ही थककर बैठ जाएंगें या फिर मैदान छोडकर भाग जाएंगें। इसलिए हमारे उत्साह को बनाए रखने के लिए प्रलोभन के रूप में समय समय पर कुछ न कुछ थोडा बहुत सुख भी हमें दे दिया जाता है। पर इस सुख का वास्तविक मूल्य जो कुछ है,वह इतना ही है।
इस नियति की तुलना में क्षुद्र मनुष्य में भी अहंकार कम नहीं है। इस विशाल जगत में उसकी स्थिति किसी कीडे मकोडे से अधिक नहीं है,काल की अनादि अनन्त धारा में उसका अस्तित्व एक तिनके,धूल के एक कण से भी तुच्छ है, बिल्ली के सामने चूहे की भांती असहाय और बेबस है----लेकिन फिर भी अपनी सफलता के क्षणों में वह इन दुर्बलताओं को भूलकर वह अपनी विजय का ऎसा ढिंढोरा पीटता है कि कुछ समय के लिए ऎसा लगने लगता है कि मानों इस अखिल ब्राहंड का संचालक सूत्रधार वही है। किन्तु यह भ्रम बहुत देर तक नहीं रहता। बहुत शीध्र उसे अपनी वास्तविक स्थिति का अहसास करा दिया जाता है। उसकी विवशताएं उसकी विजय के गुब्बारे की फूँक को झट से निकाल बाहर करती है।
अपने आपको सर्वज्ञ समझने वाला यह मनुष्य जिन लालसाओं से प्रेरित होकर अनवरत भागता रहता है,सारी शान्ती और विश्राम को बलिदान कर देता है,वे किसी मरीचिका से अधिक कुछ सिद्ध नहीं होती।
पता नहीं ये कैसी माया है--जिसे आज तक कोई सुलझा नहीं पाया। इस संसार में विद्वानों की कभी कोई कमी नहीं रही, लेकिन आदिकाल से यही होता आया है कि जितना इस अबूझ पहेली को सुलझाने की कौशिश की गई है, उतनी ही ये ओर उलझती चली गई। या तो कोई किसी निष्कर्ष तक पहुँच नहीं पाया या फिर उमर खय्याम के शब्दों में "उसी डयोडी के पहुँचे पास, किया था जिस पर से प्रस्थान"
क्या मालूम इस पहेली का कभी कोई हल निकलेगा भी कि नहीं !!!

26 टिप्पणियाँ:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

एकदम सही बात वत्स साहब , और यह एक फैक्ट है कि नियति अपना हिसाब-किताब वक्त पर पूरा करती है ! औरंगजेब ने भी शायद ही कभी सपने में सोचा होगा, आगे चलकर उसकी पुस्ते इलाहबाद में रिक्शा चलायेंगी ! आज ही मैं इसी सम्बन्ध में अफजल गुरु के विषय में सोच रहा था कि किस तरह उसकी फैले को सर्कार ने दबाये रखा! लेकिन फिर तुरंत दिल के किसी कोने से आवाज आई कि नियति ने अभी उसकी मौत तय ही नहीं की , हम जितना मर्जी हो-हल्ला मचा ले !

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

फैले को कृपया फाईल पढ़े !

आनन्‍द पाण्‍डेय ने कहा…

sundar vichaaron ki saral abhivyakti

DHANYBAAD

http://sanskrit-jeevan.blogspot.com/

वाणी गीत ने कहा…

नियति अबूझ माया ...सच ही ...!!

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

aaj to aapne bhi post jama di.....wahwa..sadhuwad.....

जी.के. अवधिया ने कहा…

"पता नहीं ये कैसी माया है--जिसे आज तक कोई सुलझा नहीं पाया।"

और भविष्य में भी कभी कोई सुलझा नहीं पायेगा।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

जिंदगी का ये राज़ आज तक कोई नहीं समझ पाया ।
इसलिए कर्म करना ही फ़र्ज़ है।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत सटीक बात कही है आपने. नियति को वाकई खुद नियति भी नही समझ पाई होगी.

रामराम

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

भई वाह!
बहुत ही सुन्दर और सार्थक पोस्ट लगाई है आज तो!

रंजना ने कहा…

मनुष्य के हाथों तो बस कर्म ही होता है....भाग्य तो प्रारब्ध और ईश्वर के हाथों होता है...

बहुत सटीक सार्थक विवेचना....

honesty project democracy ने कहा…

जीवन पथ पर चलते चलते एक समय ऎसा भी आता है जब प्रत्येक व्यक्ति को ये सत्य स्वीकार करना ही पडता है,ये एकदम सत्य कहा आपने लेकिन दुष्टों और कुकर्मियों ने सत्य को असत्य में बदलने का हर समय प्रयास किया है और यह हमलोगों के एकजुट नहीं होने की कमजोरी के कारण हुआ है / हम चाहते हैं की इंसानियत की मुहीम में आप भी अपना योगदान दें / पढ़ें इस पोस्ट को और हर संभव अपनी तरफ से प्रयास करें http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/05/blog-post_20.html

राज भाटिय़ा ने कहा…

नियति की ये अबूझ पहेली ना कोई बूझ पाया है ना ही कोई बूझ पायेगा, हम सोचते तो बहुत आगे की है लेकिन हमे पता यह भी नही की अगला सांस भी हम अपनी मर्जी से ले सकते है या नही आज विगायाण ने बहुत तरक्की कर ली है, लेकिन किस कीमत पर?? ओर्यह नियति जब चाहे उस पर पानी फ़ेर देती है, आप ने बहुत सुंदर ओर सटीख लिखा.
धन्यवाद

दिवाकर मणि ने कहा…

"माया बड़ी ठगिनी हम जानीं"

ali ने कहा…

आपसे उम्मीद थी !

महफूज़ अली ने कहा…

नियति से तो मैं भी बहुत परेशां हूँ...

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

@भाई अली जी,
आप भी कहाँ उम्मीद लगा बैठे....भाई हम अज्ञानी आदमी कहाँ आपकी उम्मीदों पे खरा उतर सकते हैं :-)

zeal ने कहा…

We are mere puppets in the hands of almighty.

Enjoy the game fully.

Kumar Jaljala ने कहा…

असली मीनाकुमारी की रचनाएं अवश्य बांचे
फिल्म अभिनेत्री मीनाकुमारी बहुत अच्छा लिखती थी. कभी आपको वक्त लगे तो असली मीनाकुमारी की शायरी अवश्य बांचे. इधर इन दिनों जो कचरा परोसा जा रहा है उससे थोड़ी राहत मिलगी. मीनाकुमारी की शायरी नामक किताब को गुलजार ने संपादित किया है और इसके कई संस्करण निकल चुके हैं.

अमित शर्मा ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
अमित शर्मा ने कहा…

ईश्वरीय विधान के अनुसार हमें ऐसा कुछ प्राप्त नहीं होता, जिसके हम पत्र नहीं है,कर्मसिधांत अकाट्य और सुनिचित है. जो कुछ भी हमें भोगना पड़ता है वह हमारे ही अच्छे-बुरे कर्मों का फल है .'अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभं '. इसलिए प्रारब्ध को निभाना ही हमारी नियति है ------------- पहले बना प्रारब्ध,पाछे बना शरीर / तुलसी चिंता छाड़ीके, क्यों न भजे रघुबीर//

दिनेश शर्मा ने कहा…

बहुत सही कहा।

प्रकाश गोविन्द ने कहा…

वत्स जी आपके मन की स्थिति कुछ ठीक नहीं लग रही !
जिस पहेली को बूझने की बात कर रहे हैं वो अंतर्मन की यात्रा करके ही शांत हो सकती है.
आपका मन अध्यात्म की तरफ अग्रसर हो रहा है !
अध्यात्म कोई बुरी चीज नहीं बशर्ते वह पलायनवाद पर न टिका हो !
सच्चा अध्यात्म वही है जो सामान्य जीवन में लागू हो !
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मन की यह उथल-पुथल बहुत जरूरी है
सुन्दर पोस्ट
सदा प्रसन्न रहिये

E-Guru Rajeev ने कहा…

बहुत ही सही प्रश्न उठाया है आपने पर हम युगों-युगों तक कभी भी इस प्रश्न का उत्तर नहीं पा सकेंगे !!

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति... साधुवाद....

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

कुछ बातें अलसुलझी रह जाना ही उचित रहता है।
--------
भविष्य बताने वाली घोड़ी।
खेतों में लहराएँगी ब्लॉग की फसलें।

निर्मला कपिला ने कहा…

नियती को समझ कर हम उसे भी बेनियत कर देंगे इस लिये अनसुल्झी रहे तो अच्छा है। बहुत अच्छी लगी पोस्ट।

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