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शुक्रवार, 7 मई 2010

अंतिम पाठ


बहुत पुराने जमाने की बात है। किसी देश के एक राजा ने अपने पुत्र को शिक्षा प्राप्ति के लिए ऋषि के आश्रम में भेजा। वहाँ रहकर राजकुमार ने आश्रम के नियम और कायदों का पालने करते हुए बहुत ही मेहनत से शिक्षा पूरी की। शिक्षा पूर्ण होने पर जब राजकुमार के घर जाने का समय आया, तो राजा अपने बेटे को लेने आश्रम पहुंचे। गुरु ने राजा का पूरा सम्मान किया और राजकुमार की बुद्धि तथा गुण ग्राहता की खूब प्रशंसा की। आश्रम के सभी शिष्य भी उस समय वहां उपस्थित थे। अब राजकुमार ने गुरु के चरणों में प्रणाम करके विदा मांगी तो गुरु बोले, "बेटा, जाने से पहले जरा मेरी छड़ी तो लाकर दे दो।"
 

राजकुमार ने गुरु की छड़ी लाकर उन्हें दी। गुरु छड़ी लेकर खड़े हुए फिर सबके सामने उन्होंने राजकुमार को दो छड़ी कस कर जमाईं। गुरु के इस व्यवहार से आश्रम के सभी शिष्य आश्चर्य में पड़ गए, क्योंकि आज तक गुरु ने किसी शिष्य को छड़ी से मारने की बात तो दूर, किसी को डांटा तक नहीं था। वह सभी शिष्यों को बेटे की तरह मानते थे। मार खाकर भी राजकुमार इस प्रकार निर्विकार भाव से खड़ा रहा, मानो कुछ हुआ ही न हो, लेकिन पुत्र की पिटाई देखकर राजा को एकदम से क्रोध आ गया। वह बोले, "आचार्यवर, आपने मेरे बेटे को किस अपराध के लिए दंडित किया है। मुझे तो कुछ दिखाई नहीं पड़ा।"

गुरु मुस्करा कर बोले, "राजन, आप इसे नहीं समझेंगे। राजकुमार सभी शिष्यों में सर्वोत्तम है। बहुत विनम्र है, आज्ञाकारी है, लेकिन उसकी शिक्षा का अंतिम पाठ अभी पूरा नहीं हुआ था। अब पूरा हो गया है। अब वह घर जा सकता है।"

 "मैं कुछ समझा नहीं आचार्यवर।" राजा ने कहा। आचार्य बोले, "महाराज, आप राज्य के शासक हैं। अपनी प्रजा को आप कठोर दंड देने में जरा भी संकोच नहीं करते। कल को आप का बेटा आपका उत्तराधिकारी होगा। आप की तरह इसे भी दूसरों को दंड देना पड़ेगा। उस समय इसको इतना अनुभव तो होना ही चाहिए कि किसी को दंड देते समय उसके मन की दशा क्या होती है। राजन, सफल शासक वही होता है जो दूसरों की वेदना की अनुभूति करने में सक्षम हो। मैंने राजकुमार को उसी का अनुभव कराया है।"

9 टिप्पणियाँ:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

वाह, ज्ञानप्रद कहानी वत्स साहब, यही फार्मूला अपनाते हुए मंत्री बनाने से पहले अगर अपने देश के इन भरष्ट नेतावों के पिछवाड़े पर भी दो- दो लाते जनता द्वारा कसकर जमाई जाएँ :) ...... ???? निश्चित तौर पर देश का भला होगा !!

अन्तर सोहिल ने कहा…

बेहतरीन ज्ञानवर्धक और शिक्षाप्रद पोस्ट

Udan Tashtari ने कहा…

शिक्षाप्रद प्रसंग.

अल्पना वर्मा ने कहा…

सफल शासक वही होता है जो दूसरों की वेदना की अनुभूति करने में सक्षम हो.
-शिक्षाप्रद कथा.

राज भाटिय़ा ने कहा…

आप से सहमत है जी, बहुत सुंदर विचार

Amit Sharma ने कहा…

और आज छड़ी तो दूर की बात कोई शिक्षक कुछ कह के तो देखलो अपने शिक्षार्थियों से कुछ!!!!!!!!
गुरु-शिष्य की इस परम्परा के विखंडन के कारण ही समाज का ये सत्यानाश हुआ है.
बहुत शिक्षाप्रद लेख

दिनेश शर्मा ने कहा…

प्रेरणाप्रद!!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

बहुत ही रोचक एवं प्रेरक कथा है, आभार इसे हमारे साथ साझा करने के लिए।
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बूझ सको तो बूझो- कौन है चर्चित ब्लॉगर?
पत्नियों को मिले नार्को टेस्ट का अधिकार?

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

वाह वत्स जी बढ़िया द्रिष्टांत..

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