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सोमवार, 19 अप्रैल 2010

दिल में ईंटे हैं भरी, लब पै खुदा होता है !!!

मानवी इतिहास साक्षी है कि आजतक संसार में कोई जाति बिना धर्म के नहीं रही और न ही कभी आगे रह सकती है। धर्म की भूख तो इन्सान के ह्रदय में है। जिस प्रकार भूखा इन्सान कभी उचित या अनुचित खाने से भी पेट भर लेता हैं, उसी प्रकार कभी कभी जातियाँ या कोई व्यक्ति अपनी धर्म की भूख को उन चीजों से भी बुझाने का प्रयत्न करते हैं जो कि वस्तुत: उनके लिए हानिकारक हैं। परन्तु जिस प्रकार बिना खाए मनुष्य जीवित नहीं रह सकता उसी प्रकार बिना धर्म के भी कोई जाति नहीं रह सकती। अकाल में पीडित इन्सान रेत तक फाँक जाते हैं, भूख के मारे इन्सान अगर कुछ ओर साधन न मिले तो इन्सान तक का को मारकर खा लेता है। परन्तु इससे यह नहीं समझना चाहिए कि यदि उसे उत्तम भोजन मिलता तो तब भी वो ऎसा ही करता या अनुचित भोजन उसे हानि नहीं पहुँचाता। इससे हानि तो होती ही है पर बेचारा क्या करे पेट नहीं मानता, भूख चीज ही ऎसी है। उस खाली पेट को भरने के लिए कुछ तो चाहिए ही। इसी प्रकार धर्म की भूख से पीडित मनुष्य सत्य-धर्म की अनुपस्थिति में अनेक रोमांचकारी साधनों से धर्म की प्यास को बुझाने का यत्न करता है और फिर उनसे नुक्सान भी उठाता है। परन्तु इस में सन्देह नहीं कि वह बिना धर्म के किसी काल के लिए भी जीवित नहीं रह सकता।
आजकल धर्म से लोग क्यों घृणा करने लगे हैं? इसके दो मूल कारण है। एक तो धर्म के नाम पर फैलता अत्याचार और दूसरा फैशन अथवा अन्धानुकरण। जब विचारशील मनुष्य देखता है कि धर्म के नाम पर आए दिन सैंकडों उपद्रव होते रहते हैं, जातियाँ एक दूसरे के खून की प्यासी हो जाती हैं, मानवी जीवन की शान्ती भंग हो जा रही है तो उसने मन में धर्म के प्रति ही घृ्णा जन्म ले लेती है। परन्तु उसकी यह घृ्णा या नफरत उसी प्रकार की है जैसे कोई भूखे को रेत फाँकता देख कर भोजन से ही घृ्णा करने लगे और कहना आरम्भ कर दे कि भोजन के कारण इतने उपद्रव होते हैं, इसलिए हमें भोजन करना ही त्याग देना चाहिए। वस्तुत: उसका कर्तव्य तो यह होना चाहिए था कि रेत फाँकने वाले से कहता कि भाई रेत उपयुक्त भोजन नहीं है। इसकी जगह तुम्हे रोटी खानी चाहिए। वस्तुत: यदि हम विचार करके देखें तो धर्म के नाम पर जो इतने उपद्रव होते हैं, वो धर्म नहीं बल्कि अधर्म है जो धर्म का भेष बनाकर इतने अत्याचार करा रहा है।
कल्पना कीजिए कि यदि मैं अपने किसी दुश्मन को परास्त करना चाहता हूँ।  लेकिन कोई मेरी सहायता को खडा नहीं हो रहा । अब यदि मैं उन साथियों के अज्ञान का लाभ उठाकर उन्हे उतेजित कर दूँ, उन्हे उल्टा-सीधा पाठ पढा दूँ  कि उस शत्रु को मारना धर्म का काम है तो वे लोग शीघ्र मेरी मदद को तैयार हो जाएंगें । इतिहास इस का साक्षी है। औरंगजेब अपने भाई दारा को मारने में उस समय तक सफल नहीं हो पाया था जब तक कि उसनें समाज को यह कहना आरम्भ नहीं कर दिया कि "दारा इस्लाम धर्म का शत्रु है"। वस्तुत: यहाँ धर्म नहीं बल्कि स्वार्थ ही युद्ध का कारण था।
किसी समय स्पेन और पुर्तगाल के लोग चाहते थे कि दक्षिणी अमेरिका की जंगली जातियों का नाश करके स्वयं वहाँ रहने लगें। अब इसके लिए कोई तो बहाना चाहिए था। हालाँकि वो जंगली जातियाँ किसी को कोई नुक्सान भी नहीं पहुँचाती थी, उल्टे कईं मौंकों पर उन्होने पुर्तगालियों की मदद ही की लेकिन फिर भी स्पेनियों और पुर्तगालियों के मन में उन पर अधिकार करने का विचार आ गया, सो उसके लिए बहाने खोजने लगे। अत: एक बार वहाँ की इंका जाति के सरदार के पास एक पादरी गया और अपनी धार्मिक पुस्तक इंजिल उसके हाथ में देकर कहने लगा कि " तुमको इसका कहना मानना चाहिए"। उस सरदार नें किताब को अपने कान के पास लगाया और यह कह कर फैंक दिया कि " यह तो कुछ नहीं कहती। तो फिर भला मैं इसकी क्या बात मानूँ"। बस फिर क्या था। यार लोगों के हाथ तो लग गया बहाना। "तुमने हमारे धर्मग्रन्थ का अपमान किया है। इसका तुम्हे बडा भारी दण्ड चुकाना होगा "। स्पेन और पुर्तगाल की जो अपने आप को सभ्य जातियाँ कहाती थी, बस टूट पडी उन जंगली कबीलों और उनका समूल नाश कर डाला। अब मैं पूछता हूँ कि इस उपद्रव का मूल कारण धर्म था या स्वार्थ। अपने हिन्दुस्तान की ही बात देख लीजिए----कहीं हिन्दु-मुसलमानों के झगडे हो रहे हैं तो कहीं दलित-सिक्खों के। लगभग 15-16 साल पहले की बात है हमारे यहाँ पंजाब में ही एकबार हिन्दु-मुसलमानों के बीच खूब मारकाट मची थी। कारण सिर्फ ये था कि मस्जिद के आगे से बारात का निकलना। हिन्दु या सिक्खों की बारात में तो खूब बैण्ड बाजा बजाया जाता है। अब मुसलमान इस बात पर भडक गए कि मस्जिद के सामने से कोई बारात नहीं निकलेगी---इससे हमारी नमाज में खलल पडता है। अब मैं पूछता हूँ कि क्या उस उपद्रव का कारण नमाज था? कदापि नहीं। जो सही रूप में नमाज द्वारा ईश्वर का ध्यान करने बैठते हैं उन भले लोगों को तो ये भी नहीं पता नहीं लगता कि मस्जिद के सामने से कोई गाडी, वाहन गुजरा है या कोई बाजा बज रहा है। हाँ जो नमाज पढने से पहले इसी खोज में लगे रहते हैं कि देखें कोई हिन्दु कहीं बैण्ड बाजा तो नहीं बजा रहा या कहीं कोई जलूस वगैरह तो नहीं निकल रहा, उनको नमाज पढने या ईश्वर का ध्यान लगाने का अवसर भी नहीं मिल सकता। नमाज वस्तुत: बहाना है स्वार्थ या जिद्द का ।

किसी शायर नें क्या खूब कहा है:-----

आये दिन मन्दिरों-मस्जिद के हैं झगडे रहते।
दिल में ईंटे हैं भरी,  लब पै खुदा होता है ।।    
 क्रमश:.........

8 टिप्पणियाँ:

जी.के. अवधिया ने कहा…

सही कह रहे हैं आप! धर्म तो मानवता के हित के लिये होते हैं यह तो स्वार्थ ही है जो धर्म का रूप धारण कर अनर्थ करवाता है।

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

धर्मी होगा तभी तो मानवता की बात करेगा, जिसका कोई दींन -ईमान ही नहीं, धर्म कहाँ से हुआ ?

राज भाटिय़ा ने कहा…

आप ने सही कहा जो अपनी पुजा पाठ ओर नमाज मै सच्चे मन से मगन होगा उसे दुनिया दारी का इलम ही कहा होगा.... ओर जो अधर्मी होगा उस के लिये पुजा पाठ ओर नमाज तो एक बहाना है...
गुरु नानक देव जी तेरा तेरा कहते ही भगवान को उस खुदा को पा गये थे

Udan Tashtari ने कहा…

बिल्कुल सही कहा आपने. पूर्णतः सहमत!

अल्पना वर्मा ने कहा…

बहुत ही गंभीर विषय पर लेख लिखा है..सच है धर्म की हानि हो ही रही है उनके लिए आज का मानव ही जिम्मेदार है.
धर्म को जीवन जीने का मार्गदर्शक बनाने के स्थान पर जब स्वार्थ पूर्ति या अहम का मुद्दा बना लेते हैं तब ही ऐसी विनाशकारी स्थितियां जन्म लेती हैं.
आप के लेख को पढ़ कर शायद कुछ ग़लत विचार धारा वाले लोग सीख लें.
आगे की कड़ी का इंतज़ार.
[अपनी पोस्ट पर आप की राय अच्छी लगी.आप ने सही ही तो लिखा है.आप के vicharon से सहमत हुई.
और हाँ ,जब हम विचार शून्य हो जाते हैं तब ऐसे शब्द ही रोशनी देते हैं.
धन्यवाद.]

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बिल्कुल सटीक, आपसे सौ प्रतिशत सहमत.

रामराम.

बेनामी ने कहा…

बिल्कुल सही कहना है आपका.
धारयति इति धर्म:

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

apki post bahut acchhi lagi, apka blog pahli baar padha...aage b intzar rahega. shukriya.

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