उस युग के मनुष्यों को यह बात क्यों नहीं सूझी?। क्या वें लोग दूरदर्शी न थे?। लेकिन ऎसा कहना शायद अपने पूर्वजों की ज्ञानशक्ति का अपमान करना तथा उन्हे गाली देने के समान होगा क्यों कि आज हमारे सामने ऎसे सैंकडों, हजारों नहीं बल्कि लाखों की संख्या में प्रमाण विद्यमान हैं, जो उस युग मे विद्वान मानव की बुद्धि तीव्रता तथा ज्ञान का साक्षात परिचय दे रहे हैं। ऎसे असंख्यों प्रमाण दिए जा सकते हैं, जो कि उनके भौतिक और पारलौकिक विचारों की उच्चता, असाधारणता, विशालता और विलक्षणता को प्रकट करते हैं। फिर क्या कारण है कि बाल की खाल खींचने वाले और अनन्त ब्राह्मंड के रहस्यों को उजागर करने वाले उन मनीषियों नें इस प्रश्न का समाधान नहीं किया। इसके उत्तर में यह कहा जा सकता है कि "धर्म की क्या आवश्यकता है" यह एक मौलिक प्रश्न है। "धर्म क्या है ?" यह केवल शाखा सम्बंधी है। मौलिक प्रश्न शाखा सम्बंधी प्रश्नों की अपेक्षा सदैव गूढ होते हैं। सम्भव है कि विलक्षण मति होते हुए भी उस युग के मनुष्यों को यह बात न सूझी हो या उन्होने इस सवाल का जवाब देना किन्ही विशेष कारणों से जरूरी न समझा हो। होने को तो कुछ भी हो सकता है। परन्तु एक प्रश्न फिर भी अनुतरित रह जाता है, वो यह कि "धर्म का प्रश्न मनुष्य समाज के गले कैसे पड गया ?" हम संसार की समस्त जातियों, धर्मों को इस प्रश्न की विवेचना करते हुए पाते हैं , चाहे वह सभ्य जातियाँ हो या असभ्य। इनके जीवन का अधिकाँश इसी प्रश्न की मीमांसा में बीत जाता है कि "धर्म क्या है ?" इनके इतिहास की विशेष घटनाऎं, इनके साहित्य के मुख्य ग्रन्थ, इनके युद्ध, इनकी सभाऎं, इनकी सामाजिक क्रान्तियाँ, इनकी सन्धियाँ, इनके विग्रह सभी किसी न किसी अंश में इस प्रश्न से सम्बन्ध रखते हैं।चलिए हम यह मान लेते हैं कि उस युग के लोग धर्मरूपि वृ्क्ष की जड तक न पहुँच पाए हों। परन्तु इस वृ्क्ष से उनका परिचय ही कैसे हुआ, जिसने इनके समस्त सामाजिक और व्यैक्तिक जीवन को प्रभावित कर दिया ?। आखिर ये धर्म क्या चीज है, जिसने उस युग के मनुष्यों को इतना मोहित कर डाला। अब ये है तो फिर इसका कोई मूल भी रहा होगा। "धर्म की क्या आवश्यकता है" यह प्रश्न उतना ही सुसंगत या असंगत हो सकता है जितना यह प्रश्न कि "मनुष्य की क्या आवश्यकता है ?"
आज इस युग में विज्ञान की उतरोतर उन्नति हो रही है और इस विज्ञान के अनेकानेक विभाग तथा उससे भी आगे उनके उपविभाग भी उन्नति के विषय में विशाल वृ्क्ष के सदृ्श हो चुके हैं। समाज शास्त्र, अर्थशास्त्र, मनोशास्त्र, भूगोल, इतिहास इत्यादि अगणित शास्त्रों की मीमांसा हो रही है। उनमें इस प्रकार के प्रश्न आते हैं कि मनुष्य समाज कैसे बना?। उसने कैसे उन्नति या अवनति की? उसने जड प्रकृ्ति पर क्या प्रभाव डाला? उसने धरातल पर क्या क्या परिवर्तन किए? आगे भविष्य में उसकी किस प्रकार और कैसे उन्नति हो सकती है? परन्तु अभी तक मेरी दृ्ष्टि में यह प्रश्न नहीं आया कि "मनुष्य की क्या आवश्यकता है?" । य तो अभी तक इस युग के विद्वानों को यह प्रश्न सूझा नहीं है या फिर उन्होने जानबूझकर इसकी विवेचना करना उचित नहीं समझा। उन्होने यह बात स्वयंसिद्धि की भान्ती मान ली कि मनुष्य है और रहेगा। चाहे किसी की दृ्ष्टि में उसकी कोई आवश्यकता हो अथवा न हो। इसलिए इस प्रश्न को उठाना ही व्यर्थ है।
मैं समझता हूँ कि प्राचीन लोगों नें धर्म को मनुष्य के गले में बंधा हुआ पाया। जिस प्रकार आँख, नाक, कान, हाथ, मुँह आदि अन्य अंग मनुष्य जन्म से ही अपने साथ लेकर आया, उसी प्रकार धर्म भी उसके साथ लगा हुआ था। यही कारण है कि वर्तमान युग के मनुष्यों के अनथक प्रयासों के बाद भी धर्म संसार से निकल नहीं पाया। यदि एक रूप में निकलता है तो दूसरे रूप में सामने आ जाता है। बिल्कुल हवा की मानिन्द। आजकल के बहुत से लोग इस प्रयास में लगे हुए हैं कि धर्म की मुश्कें बाँध के इसे संसार से बाहर फैंक दिया जाए। किसी विद्वान(?) वैज्ञानिक का कथन है कि "The day of religion has passed and religion must now be replaced by science" यानि कि धर्म के दिन अब लद गए। अब धर्म के स्थान पर विज्ञान का राज्य होगा। आज बहुत से लोग जिनको विज्ञान की तो गन्ध भी न लग पाई लेकिन इन पश्चिम वैज्ञानिकों की देखा देखी उनके स्वर में स्वर मिलाकर कहते हैं कि धर्म एक अनावश्यक ढोंग है और हमारे जीवन का पथ प्रदर्शक विज्ञान को ही होना चाहिए।
एक तरह से इसका अर्थ तो ये हुआ कि हमारे जीवन का कोई प्रदर्शक होना ही नहीं चाहिए। क्यों कि विज्ञान का स्वयं इतना ही उदेश्य है कि उन सब वस्तुओं का अध्ययन करे जो वर्तमान हैं। इसलिए विज्ञान कभी मनुष्य जीवन का पथ प्रदर्शक हो ही नहीं सकता। प्रत्येक बुद्धिमान इन्सान इस बात को भलीभान्ती जानता है कि विज्ञान की भूमिका मनुष्य के लिए एक सेवक से बढकर नहीं है.......ओर आवश्यक नहीं कि सेवक सदैव आपका हितैषी ही हो। इसलिए विज्ञान पर इतना भी अधिक विश्वास न किया जाए कि कल को ये मूर्ख बन्दर की भान्ती अपने स्वामी का गला ही काट डाले..............
क्रमश:....



12 टिप्पणियाँ:
ढोंग, और वो भी अनावश्यक!
विज्ञानं धर्म का स्थान नहीं ले सकता, धर्म का पूरक बन सकता है
इसलिए विज्ञान कभी मनुष्य जीवन का पथ प्रदर्शक हो ही नहीं सकता। प्रत्येक बुद्धिमान इन्सान इस बात को भलीभान्ती जानता है कि विज्ञान की भूमिका मनुष्य के लिए एक सेवक से बढकर नहीं है.......ओर आवश्यक नहीं कि सेवक सदैव आपका हितैषी ही हो। इसलिए विज्ञान पर इतना भी अधिक विश्वास न किया जाए कि कल को ये मूर्ख बन्दर की भान्ती अपने स्वामी का गला ही काट डाले..............
शत-प्रतिशत सत्य वचन.
वास्तव में धर्म एक अनावश्यक ढोंग है .nice
विज्ञान एक चर्म सीमा पर पहुच कर फ़िर से जीरो बन जाता है, लेकिन धर्म हमेशा वेसा ही रहता है, इसे मानने वाले बदल जाते है, इस के तॊर तरीके बदल सकते है, इस मै बुरईयां आ सकती है, लेकिन धर्म हमेशा रहेगा, बहुत सुंदर लिखा धन्यवाद
धारयेति इति धर्मः .....विज्ञान ही समकालीन धर्म है !
धर्म में बहुत सी अन्य बातों के साथ दर्शन और विज्ञान भी सम्मिलित हैं। विज्ञान तो धर्म का मात्र एक अंग है और वह कभी भी धर्म का स्थान नहीं ले सकता।
आपकी बात से सहमति! विज्ञान कभी धर्म का स्थान नहीं ले सकता. धर्म तो मानव का स्वभाविक गुण है और चाहे परिस्थितियाँ बदल जाएं परन्तु स्वभाव नहीं बदला करते.
जितनों का गला भगवान के नाम पर काटा गया है उससे ज्यादा जिंदगियां विज्ञान हर साल बचाता है. भगवान डराता है, विज्ञान डर दूर करता है. भगवान शक्तिहीन बनाता है विज्ञान शक्तिवान. भगवान सर झुकवाता है, विज्ञान आसमान की बुलंदियों से आगे ले जाता है.
अगर कोई भगवान है तो निश्चय है एक ऐसा प्राणी है जिसने विज्ञान के शिखर को छुआ होगा.
अगर हम विज्ञान का उपयोग करें और सम्मान करें तो भगवान ही क्यों न बनेंगे?
और भगवान अगर है तो इसी पल मैं उसकी शान में गुस्ताखी करने के जुर्म में उसके द्वारा मृ्त्यु को सौंपे जाकर अनंत काल में नर्क में जलने के लिये भेज दिया जाऊं, नहीं तो विज्ञान ही भगवान है.
जय विज्ञान
मैं मरा नहीं, जिंदा हूं.
जय विज्ञान.
आपकी इस सुन्दर पोस्ट की चर्चा यहाँ भी तो है!
http://charchamanch.blogspot.com/2010/04/blog-post_19.html
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