would like to thank you, for taking time to visit my blog

शनिवार, 20 मार्च 2010

इन्सान सिर्फ चिन्तन से ही वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति कर सकता है!!!!

मनुष्य एक चिन्तनशील प्राणी है। चिन्तन करना उसका स्वभाव भी है और धर्म भी। संसार के विषयों का चिन्तन मनुष्य का उन विषयों से परिचय बढाता है और उन्हे सांसारिक कार्यों में सफलता दिलाने में सहायक होता है, धार्मिक/आध्यात्मिक चिन्तन परमार्थ का साधन है। जो मनुष्य स्वयं चिन्तन करना छोड देता है,वह न तो सांसारिक जीवन में सफलता हासिल कर सकता है और न ही सत्य को समझ सकता है।
सर्वोच्च चिन्तन का ध्येय आत्मज्ञान प्राप्त करना ही रहता है। प्रत्येक मनुष्य चिन्तन से ही आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर सकता है। भौतिक विज्ञान की बात करें तो उसमें इन्सान को किसी तत्व की खोज बार बार नही करनी पडती। अब एक इन्सान नें एक बार किसी सिद्धान्त को खोज लिया तो बाकी सारी दुनिया उसकी इस खोज से सुगमता से लाभ उठाती है। लेकिन ऎसी बात आध्यात्मिक खोज के विषय में लागू नहीं होती। हरेक इन्सान को अपने सत्य की खोज स्वयं ही करनी पडती है। किसी दूसरे इन्सान का प्रयत्न हमारा सिर्फ पथ-प्रदर्शन कर सकता है, लेकिन सत्य की अनुभूति नहीं करा सकता। जो इन्सान चिन्तन के परिश्रम से बचना चाहे और फिर भी चाहे कि उसे सत्य के दर्शन हों तो इससे बडी मूर्खता कुछ ओर नहीं हो सकती।
जो वस्तु इन्सान अपने प्रयत्न से प्राप्त करता है तो उस वस्तु के प्रति उसका प्रेम होना स्वाभाविक है। कठिन परिश्रम से हासिल की गई वस्तु की मनुष्य भलीभान्ती देखभाल करता है, उसे सुरक्षित रखता है और नष्ट होने से बचाने की चेष्टा करता है। ऎसे ही अपने खोजे हुए सत्य की ही कीमत होती है, जीवन मे वही हमारे काम आता है। दूसरों के विचार दूसरों के ही होते हैं। उन विचारों को रट लेने से वे हमारे नहीं बन जायेंगें। हमारे विचार तो वें ही हैं जो हम अपने अनुभव के मन्थन से निकालते हैं। दूसरो के विचार हमारे उसी दशा में हो सकते हैं जब हम भली प्रकार से उनका मनन करें। जब कि अधिकतर ऎसा नहीं होता---अक्सर बहुत से लोग दूसरे लोगों के विचार अपने दिमाग में ठूंसते चले जाते हैं । इस प्रकार के विचार ठूंस लेने से उन्हे दिमागी बदहजमी हो जाती हैं । आज इस तरह के पोथी पढकर बने पठित मूर्खों की ही संख्या बढ रही हैं। वास्तव में जिस विचार के ऊपर हम चिन्तन नहीं करते, वह हमारी प्रतिभा न जगा करके उसका विनाश ही करता है। इन्सान का दिमाग बिल्कुल एक स्प्रिंग के जैसे होता है। यदि उसके ऊपर कोई भारी बोझ देर तक रख दिया जाए तो उसका सब लचीलापन जाता रहता है। बिना चिन्तन किए सिर्फ पुस्तकें पढ पढ कर रट्टे मारे हुए इन्सान का दिमाग उस ब्लैकबोर्ड के जैसे हो जाता है, जिस पर बार बार बिना उसे साफ किए लिखा जाता रहा हो। जिस प्रकार कुछ समय के बाद उस ब्लैकबोर्ड पर इधर उधर ऊटपटांग आडी तिरछी लाईनों के अतिरिक्त ओर कुछ नहीं दिखाई देता, ठीक उसी तरह पोथी पढे पंडित(रटन्तु तोते) के दिमाग में भी कुछ भी स्पष्ठ नहीं रहता।
विरला ही कोई मनुष्य होगा जो स्वयं चिन्तन करता है। संसार के कितने मनुष्य हैं जो विद्वान होने का गौरव तो प्राप्त करना चाहते हैं लेकिन उनमें इसकी वास्तविक योग्यता एक धेले की भी नहीं होती। ऎसे लोग बहुत सी पुस्तकें पढ लेंगें, इधर उधर से रट्टे लगा लेंगें। वे इस प्रकार स्वयं के परिश्रम से बच कर सरलता से ज्ञानी बनना चाहते हैं, लेकिन बन जाते हैं मूर्ख। यह सत्य है कि जिस निष्कर्ष पर हम कईं दिनों के चिन्तन के पश्चात पंहुचते हैं, वही सत्य एक साधारण सी पुस्तक या कहीं लिखें हुए को पढकर मिल सकता है; किन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी मेहनत से प्राप्त किया हुआ, जाना हुआ सत्य ही हमारा होता है और उसी का हम अभिमान कर सकते हैं, वही हमारे स्वभाव का अंग बन सकता है। हमारे मन की प्रत्येक तह में अपनी जडें जमा सकता है, जब कभी किसी कठिनाई का सामना करना पड जाए तो वही हमारी सहायता करता है, हमारे मन को ढाढस देता है।
अपना विचार चाहे कैसी भी भाषा में हो दूसरे लोगों की सुन्दर से सुन्दर भाषा में लिखे गये विचारों से अच्छा ही है। जिस प्रकार मनुष्य की प्राकृ्तिक नाक ही उसे शोभा देती है और नकली या किसी दूसरे की नाक उसे शोभा नहीं दे सकती, उसी प्रकार हमारे स्वयं के विचार ही हमें शोभा देते हैं, चाहे उनमें कितनी ही कमी क्यों न हो।

13 टिप्पणियाँ:

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

प्रत्येक मनुष्य चिन्तन से ही आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर सकता है..आपकी इस लाइन नें मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया.
इस पोस्ट के लिए धन्यवाद.

AlbelaKhatri.com ने कहा…

आज मनुष्य ने चिंतन करना छोड़ दिया है और व्यर्थ की चिंताओं में डूब चुका है इसीलिए संसार में हर दिशा दुःख और वेदना के पहाड़ नज़र आ रहे हैं

आशा है, आपका आलेख इस आग को बुझाने का काम करेगा

बहुत ही उत्तम आलेख ........बधाई !

राज भाटिय़ा ने कहा…

भाई आप का लेख तो शाम को पढूंगा अी मेहमान आने वाले है, लेकिन आप के टेमलेट का रंग पुरुषो के लिये नही, यह रंग सिर्फ़ महिलयो के लिये ही अच्छा लगता है, आप इस का रंग बदल ले, बुरा लगे तो माफ़ करना

vinay ने कहा…

आत्मचितंन तो सर्बश्रेष्ठ चितंन है,यह स्वंय ही इन्सान अनुभव कर सकता है ।

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

चिंतन बहुत सब्जेक्टिव शब्द है भई.

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

भाटिया जी, टैम्पलेट का रंग तो हमें भी कुछ जँच नहीं रहा था...लेकिन इसे बदलने का ध्यान नहीं रहा..आपने याद दिलाया तो इसे अभी बदल देते हैं।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

सर्वश्रेष्ठ तो आत्म चिंतन ही है. उसके बिना सब कुछ पशुवत है.

रामराम.

पल्लवी ने कहा…

बहुत सुन्दर विचार.

दिनेश शर्मा ने कहा…

''किसी दूसरे इन्सान का प्रयत्न हमारा सिर्फ पथ-प्रदर्शन कर सकता है, लेकिन सत्य की अनुभूति नहीं करा सकता।''
बहुत सुन्दर।

अल्पना वर्मा ने कहा…

'हमारी मेहनत से प्राप्त किया हुआ, जाना हुआ सत्य ही हमारा होता है और उसी का हम अभिमान कर सकते हैं, वही हमारे स्वभाव का अंग बन सकता है'
सत्य वचन ,बहुत ही गहन और मार्गदर्शक विचार हैं.

Babli ने कहा…

बहुत बढ़िया लगा! उम्दा प्रस्तुती! बधाई!

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

Chintan me hai gyan to chinta chita samaan....

रवि कान्त शर्मा ने कहा…

पंडित जी, चिन्तन किए बिना कोई मनुष्य रह ही नही सकता है, चिन्तन दो प्रकार का ही होता है, एक संसारिक चिन्तन और दूसरा ईश्वरीय चिन्तन। सांसारिक चिन्तन मनुष्य को चिन्ताग्रस्त करता है, ईश्वरीय चिन्तन चिन्तामुक्त करता है। केवल ईश्वरीय चिन्तन से ही आत्मज्ञान प्राप्त हो सकता है।

LinkWithin

Related Posts Widget for Blogs by LinkWithin

Blog Stats

Submit