मान लीजिए, अन्धश्रद्धा, अन्धविश्वास, भावावेश अथवा बौद्धिक ऊहापोह के आधार पर हमने कोई सही सिद्धान्त भी स्वीकार कर रखा हो, परन्तु होता क्या है कि--उसके प्रति हुई आसक्ति के कारण उस सिद्धान्त को स्वीकारने मात्र को ही हम सारा महत्व देने लगते हैं, जब कि उसके व्यवहारिक पक्ष को सर्वदा भुला बैठते हैं। किसी सिद्धान्त को स्वीकारने मात्र से क्या बनता है? मुख्य बात तो उस सिद्धान्त को, यदि वह सही हैं तो, जीवन में उतारना चाहिए।
यहॉ ब्लागजगत में भी बहुत दिनो से यही देखने में आ रहा है कि कुछ ज्ञानीजन समाज को,देश दुनिया को धर्म का मार्ग दिखाने में जी जान से जुटे हुए हैं। एक ओर हिन्दू धर्म की महिमा का बखान किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर कुछ लोग शान्ती के मसीहा बने दुनिया को मुसलमान होने के फायदे गिनाने में लगे हुए हैं। एक कहता है कि हिन्दू धर्म और उसकी शिक्षाएं महान हैं तो दूसरा कहता है कि आप इस्लाम अपना लो तो आप में आत्म अनुशासन, आत्म-नियन्त्रण,आत्मशिक्षा,आत्म-अनुपालन जैसे गुणों का संचार होने लगेगा।
मैं मानता हूँ कि न सिर्फ हिन्दू , न इस्लाम बल्कि दुनिया का हरेक धर्म, हरेक पंथ, हरेक सम्प्रदाय महान है। उनके धर्मग्रन्थ, उनकी शिक्षाएँ, पीर-पैगम्बर,महापुरुष इत्यादि सब महान है। लेकिन ये नहीं समझ पा रहा हूँ कि आप लोग जो दुनिया में धर्म का ज्ञान बाँटते फिर रहे हो, पोस्ट दर पोस्ट बडे लम्बे चौडे उपदेश देते रहते हो-----लेकिन तुम्हारा धर्म तुम में वो महानता क्यूं नहीं पैदा कर पाया। क्या ये महानता का प्रसाद सिर्फ दूसरो में बाँटने के लिए ही रख छोडा है, जो तुम्हारे हिस्से न आ सका। दूसरी ओर मैं उन मुस्लिम भाईयों से ये जानना चाहूँगा कि---तुम कहते हो कि इस्लाम कबूल करने का सीधा फायदा ये है कि आपमें शान्ती,प्रेम,आत्म-अनुशासन,आत्म-नियन्त्रण,आत्मशिक्षा, आत्म-अनुपालन जैसे गुणों का वास होने लगेगा---लेकिन भाई तुम तो इस्लाम के मानने वाले हो किन्तु तुम्हारे जीवन में ऎसे किसी सदगुण का संचार क्यों नहीं हो पाया। कमाल है! जिस चीज को आप लोग स्वयं जीवन में धारण नहीं कर सके, उसी के बारे में दुनिया को उपदेश देने में लगे हुए हैं। और लगे हुए हैं बस दिन रात एक दूसरे पर कीचड उछालने में, एक दूजे को नंगा करने में।
इन बडे बडे धर्म ज्ञानियों से सिर्फ यही निवेदन करना चाहूँगा कि भाई दूसरों को उपदेश देने से कहीं बेहतर है कि धर्म की उन शिक्षाओं को पहले स्वयं अपने जीवन में उतारा जाए। जो शिक्षा तुम दूसरों को दे रहे हो,वो तुम्हारे स्वयं के आचरण, व्यवहार द्वारा परिलक्षित हो तो, फिर कोई जरूरत ही नहीं रह जाएगी कि तुम लोगों को यूँ दुनिया के सामने चिल्ला चिल्ला कर अपने अपने धर्मों की खूबियाँ बतानी पडें। धर्म न हुआ मानो सब्जी मंडी हो गई--जहाँ हरेक दुकानदार अपनी सब्जी को ताजी और दूसरे दुकानदार की सब्जी को बासी बताकर ग्राहकों को आकर्षित करने में लगा हुआ है।
हे धर्म विद्वानों! आप लोग निज धर्म का इतना ज्ञान रखते हो लेकिन इतनी सी बात नहीं समझ पा रहे हो कि न तो हिन्दू धर्म महान है और न ही इस्लाम----बल्कि महानता उसी में है, जिसे जीवन में उतार लिया गया हो, वही एकमात्र सच्चा धर्म है---वर्ना तो निस्सार भावुकता है, थोथा बुद्धि विलास है।



15 टिप्पणियाँ:
"इन बडे बडे धर्म ज्ञानियों से सिर्फ यही निवेदन करना चाहूँगा कि भाई दूसरों को उपदेश देने से कहीं बेहतर है कि धर्म की उन शिक्षाओं को पहले स्वयं अपने जीवन में उतारा जाए। जो शिक्षा तुम दूसरों को दे रहे हो,वो तुम्हारे स्वयं के आचरण, व्यवहार द्वारा परिलक्षित हो तो, फिर कोई जरूरत ही नहीं रह जाएगी कि तुम लोगों को यूँ दुनिया के सामने चिल्ला चिल्ला कर अपने अपने धर्मों की खूबियाँ बतानी पडें "
साफ सुथरे विचार अत्यंत आभार !
उम्दा आलेख...अच्छा लगा पढ़कर.
पंडित जी ,
बड़ी सुन्दर बाते कही आपने / बिलाशक आपके ख्यालो से इतेफाक करता हूँ , मीमांसा करे तो '' धार्येती इति धर्म; '' बयान किया गया है लिहाजा जो अपनाये जाने योग्य है वो धर्म तो है मगर मै समझता हूँ ,बेलज्जत समझ कर छोड़ देना ही चलन हो गया है क्यों कि आरामतलबी ने मान्यताओं को भारी नुकसान पंहुचाया है हर उस चितेरे को, जो हिन्दुस्तानी समाज का मुस्सल सूरत तैयार करती है / शर्तिया कह सकता हूँ कि आने वाले ज्यादा नहीं 25 से 30 वर्षो में हिन्दुस्तान बिलायती मुल्को की जीरोक्स कोपी हो चुका होगा क्यों कि जो संबिधान हमने हुकूमत कायम रखने के लिए हमने अख्तियार किया है वो अन्ग्रेज्दा मुल्को के मानसिक सम्भोग से पैदा नाजायज औलाद है / मेरी राय में तकनीकी ज्ञान और मुल्क की हुकूमत दो जुदा किस्म बाते है / अंग्रेजी भाषा पर काबू पाना किसी भी दुश्वारी भरे हालात में मुमकिन है परन्तु अंग्रेजीदा पहनावा गुलामी कबूलने की तासीर को उजागर करता है / कई दफा किसी खतरनाक रोग के लक्ष्ण बेहद सरल से होते है , पर बाद में खौफनाक शक्ल सामने आती है और हिन्दुस्तान में भी संस्कृति रद्दोबद्दल का दौर है / बिलायती संस्कृति की कदम-बोसी तो तभी हो चुकी थी जब हमारे आकाओं ने हूकूमत के लिए संविधान उधार लिया /
अच्छे लेख के लिए शुक्रिया !
जय हो प्रभु
आपको शत-शत नमन
आप से ऐसे ही आलेख की आस कब से लगाये था, लगता है कि मेरे विचारों को आपने शब्द दे दिये हैं। बहुत-बहुत बढिया लगी आपकी यह बात, धन्यवाद
सूर्य कभी नही चिल्लाता की मुझमें तपिश है, उसकी ऊष्मा ही बता देती है।
प्रणाम स्वीकार करें
सार्थक आलेख के लिए साधुवाद्! लेकिन आप इन कूपंमंडूकों से क्या उम्मीद करते हैं कि इन लोगों में सुधार हो जाएगा ?
बहुत सुन्दर बात कही आपने.धर्म को जीवन में धारण किए बिना उसका कैसा भी कोई मौल नहीं.
प्रणाम्!
satya vachan. updesh se pahle abhyas kar le. Practice before you preach.
Bahut Accha Laga Aapka yah aalekha...Dhanywaad!!
haya bhi padhare ...
http://kavyamanjusha.blogspot.com/
अत्यंत सारगर्भित और विचारणीय पोस्ट है आपकी !
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जाति-धर्म की आड़ में भूल गया इंसान !
भूख-उदासी-बेबसी, सबकी एक समान !!
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आभार
बहुत ही सरगार्वित पोस्ट....
बहुत सुंदर ओर सटीक बात कही आप ने, धन्यवाद
"हिन्दू धर्म महान है और न ही इस्लाम----बल्कि महानता उसी में है, जिसे जीवन में उतार लिया गया हो, वही एकमात्र सच्चा धर्म है-"
सूत्र वाक्य
अब क्या बोलें कुछ बोल ही नहीं सकते
ऐगॉन रेलीगेयर का आईटर्म प्लॉन देखिये
बहुत सही लिखा है..अच्छा लगा ये बातें पढ़ना.
सारगर्भित लेख .
saadhuwad is sarthakata ke liye....
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