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मंगलवार, 27 जनवरी 2009

मनुष्यता ही सर्वोतम धर्म

अक्सर जब हम धर्म शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, तो यह देखने की कोशिश करते हैं कि उनमें ईश्वर, आत्मा, जीवन, मृत्यु और लोक-परलोक के बारे में क्या लिखा है. उनमें हम यह भी देखते हैं कि हमारे लिए धर्म सम्मत आचरण क्या है.
अभी पिछले दिनों एक पुस्तक पढने का अवसर मिला था, जिसके लेखक का नाम मुझे याद नहीं रहा. इस पुस्तक के एक अध्याय में यह दिया गया है कि अलग-अलग धर्मों में मनुष्य के बारे में क्या लिखा गया है.

हिंदू धर्म में अनेक तरह की व्याख्याएँ हैं, लेकिन उपनिषदों के अनुसार मनुष्य पशुओं में सबसे बड़ा है. वह एक ऐसा पशु है जिसमें अनश्वर आत्मा का वास है, जिसे संसार की किसी भी शक्ति द्वारा नष्ट नहीं किया जा सकता. इसलिए मानवता से महान इस जगत में कुछ भी नहीं है.

बौद्ध और जैन धर्म भी भारत भूमि से विकसित दर्शन की ही शाखाएँ हैं. जैन धर्म कहता है कि मनुष्य को ईश्वर ने बनाया है, वह जिस रूप में भी है, उसकी इच्छा के अनुसार ही बना है. वह देवत्व से थोड़ा ही कम है। ध्यान दीजिए कि जैन दर्शन में भी हिंदू उपनिषदों की तरह मनुष्य योनि को देवत्व के काफी निकट माना गया है.

लेकिन पुस्तक के मुताबिक बौद्ध दर्शन कर्मवादी है. वह ईश्वर की तुलना में मनुष्यता को ज्यादा महत्व देता है. बौद्ध धर्म कहता है कि मनुष्य अपने ही विचारों के अनुरूप बनता है. जो कुछ भी वह है, उसके सभी आदर्श, पसंद और नापसंद, उसका अपना अहम उसके अपने विचारों का ही परिणाम हैं. इसलिए यदि हम अपने जीवन और अपनी परिस्थितियों में बदलाव चाहते हैं तो हमें पहले अपने आप को ही बदलना होगा.

पुस्तक में इस्लाम और सिख मान्यताएँ भी संकलित हैं. इस्लाम कहता है कि ईश्वर ने पृथ्वी पर अपने सिंहासन पर बैठने के लिए मनुष्य का निर्माण किया. मनुष्य पृथ्वी पर भगवान का भेजा गया दूत है. ईश्वर ने हमारे ही लिए यह जमीन, पेड़-पौधे और ये दिन-रात या कहें कि इस सृ्ष्टि का निर्माण किया है. हमारे ही लिए मीठे फल और ठंडे चश्मे पैदा किए हैं.

ईसाई धर्म मानता है कि मनुष्य फरिश्तों से थोड़ा ही कम है. वह सभी मूल्यों का माप है. ध्यान दें कि इस्लाम की भांती ही ईसाई धर्म भी यही कहता है कि मनुष्य के लिए ही इस संसार की उत्पत्ति हुई है. वे भी कहते हैं कि उसी के लिए ईसा मसीह पृथ्वी पर आए और सूली पर चढ़े. मनुष्य पृथ्वी पर ईश्वर का कारिन्दा है. यदि मनुष्य असफल होता है तो सब कुछ असफल हो जाता है.

भारत में पारसी धर्म का पदार्पण बहुत पहले हो चुका था. संभवत: इस वजह से भी उसके दर्शन का हिंदू धर्म से एक साम्य नजर आता है. पारसी धर्म मानता है कि ज्ञानी पुरुष (ईश्वर) ने मनुष्य को अपने जैसा ही बनाया. शरीर में बंद मनुष्य का मस्तिष्क दिव्यता से मिला है. इसलिए मनुष्य को केवल अच्छाई पर चलना चाहिए और जो कुछ भी बुरा है उससे दूर रहना चाहिए.

कन्फ्युशियस का कोई धर्म नहीं था, वे एक दार्शनिक विचारक थे. लेकिन वे कहते थे कि ईश्वर ने मनुष्य को अच्छा बनाया। उसकी मूल प्रकृति अच्छी है, परन्तु बहुत से लोग इस अच्छाई से दूर हट जाते हैं. मनुष्य की सांसारिकता उसे नीचे की ओर खींच कर ले जाती है और भगवान से दूर कर देती है. इसलिए जो अपने अंदर विद्यमान ईश्वरीय तत्व का अनुसरण करते हैं, वे महान हैं, और जो सांसारिक तत्व का अनुसरण करते हैं, वे निकृष्ट हैं.

कन्फ्युशियस की तरह यहूदी धर्माचार्य भी यही मानते हैं कि अधिकांश व्यक्ति सांसारिक सुखों में लिप्त रहते हैं, इसलिए वे मनुष्य के लिए संभव नैतिक ऊंचाइयों तक नहीं पहुंच पाते. अहंकार महानता का बड़ा शत्रु है और वह क्रोध तथा लालच की ही तरह खतरनाक है.

इस दिव्यता की बात ताओ ने भी की है. ताओ धर्म कहता है कि मनुष्य मानव और दिव्य प्राणी दोनों है. उसके अंदर की दिव्यता अनन्त एवं अनमोल है. मनुष्य की मृत्यु हो जाती है, परंतु दिव्यता सदैव विद्यमान रहती है.

अब एक बात तो स्पष्ठ है कि चाहे संसार का कोई भी धर्म हो उन सब मे मनुष्यता के महत्व को ही रेखांकित किया गया है. किन्तु हम लोग हैं कि हमारा मंदिर,हमारी मस्जिद,हमारा गुरूद्वारा के झगडों में उलझकर धर्म ग्रंथों के सार को समझने की अपेक्षा शनै शनै पशुता की ओर बढते चले जा रहे हैं.

9 टिप्पणियाँ:

राज भाटिय़ा ने कहा…

मनुष्यता ही असली धर्म है, आप ने बिलकुल सही कहा, बहुत सुंदर लेख लिखा आप ने, ओर हा अपने बेटे का नाम लिख देते तो आज उस को प्रथम विजेता के नाम से सभी जानते, अगर अभी लाईन पर हो तो जरुर उस का नम भेजे.
धन्यवाद

varsha ने कहा…

Aapke vichaaron se na sirf sahmat hoon balki aapke hi vichaaron se mel khata lekh hamne apne blog mein likha hai waqt mile to dekhiyega.

PN Subramanian ने कहा…

बहुत ही सुंदर. हम आपसे पूर्णतः सहमत हैं. पारसियों की बात चली तो हमें भी बहुत सारी समानताएँ दिखी. उनके भारत में लंबे अरसे से बसा होना इसका कारक नहीं है. पहले से ही है. भारत के पारसियों पर हम कुछ दिनों से कार्यरत हैं और उनके नाव वर्ष "नवजोत" के दिन एक विस्तृत लेख प्रकाशित करने की योजना है. आभार.

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

Wah ji bahut hi badhiya prerak drishtant hai badhai..

seema gupta ने कहा…

अब एक बात तो स्पष्ठ है कि चाहे संसार का कोई भी धर्म हो उन सब मे मनुष्यता के महत्व को ही रेखांकित किया गया है. मनुष्यता से बढ़ कर कोई असली धर्म नही....यथार्थवादी लेख के लिए आभार..."

Regards

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत सुन्दर और प्रेरक प्रसंग. बहुत शुभकामनाएं

रामराम.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

"भारत में पारसी धर्म का पदार्पण बहुत पहले हो चुका था. संभवत: इस वजह से भी उसके दर्शन का हिंदू धर्म से एक साम्य नजर आता है."
यह सामी इसलिए है कि भारतीय और पारसी संस्कृतियाँ एक ही सिक्के के दो (विपरीत) पहलू थे. विस्तृत विवरण अनुरोध पर उपलब्ध कराया जा सकता है.

सुज्ञ ने कहा…

"जैन धर्म कहता है कि मनुष्य को ईश्वर ने बनाया"
यह भ्रांत धारणा हैं,जैन दर्शन के अनुसार यह प्रकृति एव समस्त जीवराशी व परमाणु पुद्गल सहित मानव भी अनादि है,ईश्वर द्वारा सृष्टी की रचना नहीं मानता।

बेनामी ने कहा…

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