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मंगलवार, 9 नवम्बर 2010

करें संस्कृति पूजन.......

संस्कृति अर्थात सम्यक कृति. विश्वनियन्ता द्वारा निर्मित अनन्त कृतियों में श्रेष्ठ कृति कौन सी है ? इस प्रश्न का उत्तर खोजा जाए, तो मनुष्य ही उस गौरवपूर्ण पद को प्ताप्त करेगा, यह नि:संशय बात है. भगवान नें गीता में मनुष्य को "ममैवांश" अपना ही एक अंश कहकर गौरवास्पद बनाया है.
परमेश्वर की इस श्रेष्ठ कृति मनुष्य को सदैव श्रेष्ठता के उन्नत शिखर पर स्थिर रहने का मार्गदर्शन देने वाली, हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा निर्मित विचारप्रणाली और तदनुकूल आचारसंहिता का भी काल अनुसार संस्कृति मेम समावेश हुआ. विचारों का विस्तार अनवधि कालमर्यादा में सुरक्षित रखना आसान न होने से उन महान विचारों नें सूत्रों का रूप धारण करके आत्मसंरक्षण की योजना बना ली. इन विचार-सूत्रों नें ही बाद में यथोचित प्रतीकों का रूप ले लिया. आचारसंहिता में आ रही निरे शुष्क उपदेशों की जडता को दूर करने के लिए शास्त्रकारों नें विभिन्न प्रकार के त्योहार बनाए. त्योहारों के उभंग में आचारपालन सहज और रसपूर्ण हुआ. योग्य अर्थ में यदि प्रतीकों को समझकर त्योहारों को मनाया जाए तो संस्कृति किसी भी समय पुनर्जीवित हो सकती है. प्रतीकों में बुद्धि का वैभव दिखाई देता है तो त्योहारों में भाव का प्रवाह दिखाई पडता है. प्रतीकों में बुद्धि की सजावट है तो त्योहारों में ह्रदय की शिक्षा है. आज की भाषा में कहना हो तो प्रतीक संस्कृति के विचारविज्ञान है, जब कि त्योहार हैं उन विचारों को आसानी से आचार-व्यवहार में लाने की कला. भाव और बुद्धियुक्त प्राणी होने के नाते त्योहार और प्रतीक दोनों मानव के जीवन-निर्माण में अमूल्य योगदान करते हैं. भाव और बुद्धि जीवन में ऎसे सम्मिश्रित हुए हैं कि उन दोनों को पृथक-पृथक देखना कठिन है और इसीलिए कईं प्रतीकों को और त्योहारों को अलग करना अशक्यवत प्रतीत होता है.
हमारे प्रतीक और त्योहारों का सभ्यता की अपेक्षा संस्कारों से कहीं गहरा नाता है.संस्कार-सर्ज में उन सांस्कृतिक तत्वों का हिस्सा बहुत ही प्रशंसनीय है.
संस्कृति को देश-काल की मर्यादा की रूकावट नहीं होती. संस्कृति की प्राचीनता या अवार्चीनता की झंझट में पडे बिना उसकी वर्तमान श्रेष्ठता का नि:संकोच स्वीकार करना ही बुद्धिमान इन्सान का लक्षण है.
भारतीय संस्कृति याने वेदमान्य और व्यासमान्य संस्कृति. प्रत्येक मानव को उसकी समस्यायों का हल भारतीय सांस्कृतिक विचारधारा से प्राप्त हो सकता है. लेकिन इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि समग्र विश्व को चिरंतन मार्गदर्शन दे सकने में समर्थ इस संस्कृति की महानता को न समझने वाला आज का भारतवासी अपने प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए विश्व भर में भटकता फिर रहा है.
आज के युग में सबसे पहले तो हममें भारतीय संस्कृति के लिए अस्मिता निर्माण होनी चाहिए और "मैं भारतीय हूँ" इस बात का गौरव होना चाहिए. "भारत की इस धरती पर जन्म लिया, यह मेरा सौभाग्य है"-----यह भावना यदि पक्की होगी तो मानव संस्कृति का सच्चे अर्थ में पूजन कर सकता है. पूजन में समर्पण गृहित है. जब संस्कृति मुझे प्यारी होगी तभी मैं उसके चरणों पर अपना जीवन भावपूर्ण अन्त:करण से समर्पित कर सकता हूँ.
संस्कृति के तत्वों को जीवन में चरितार्थ करने का प्रयत्न करना और सांस्कृतिक विचार विश्व के कोने-कोने में पहुँचाने के लिए कटिबद्ध होना ही सच्चा संस्कृति-पूजन है. तो फिर, आईये लक्ष्मी पूजन कर चुकने के बाद अब क्यों न संस्कृति पूजन् आरम्भ किया जाए!!!

बुधवार, 3 नवम्बर 2010

मनायें उत्सवों का स्नेह सम्मेलन

दीपोत्सव याने आनन्द का उत्सव, उल्लास का उत्सव, प्रसन्नता का उत्सव, प्रकाश का उत्सव! दीपोत्सव सिर्फ एक उत्सव ही नहीं है, बल्कि उत्सवों का स्नेह सम्मेलन भी है. धनतेरस, काल चतुर्दशी, दिपावली, नया साल और भैय्यादूज---ये पाँच उत्सव पाँच विभिन्न सांस्कृतिक विचारधाराएँ लेकर इस उत्सव में सम्मिलित हुए हैं. जागृत समझदारी से यदि ये उत्सव मनायें जाएं तो मानव को समग्र जीवन का सुस्पष्ट दर्शन प्राप्त हो जाए.

धनतेरस:- धनतेरस अर्थात लक्ष्मीपूजन का दिन. भारतीय संस्कृति नें लक्ष्मी को तुच्छ या त्याज्य मानने की गलती कभी नहीं की है, उसने लक्ष्मी को माँ मानकर उसे पूज्य माना है. वैदिक ऋषि नें तो लक्ष्मी को संबोधन करके श्रीसूक्त गाया है:-

ॐ महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नि च धीमहि
तन्नो लक्ष्मी: प्रचोदयात !!

(महालक्ष्मी को मैं जानता हूँ! (जिस) विष्णु पत्नि का ध्यान करता हूँ, वह लक्ष्मी हमारे मन, बुद्धि को प्रेरणा दे!)

कहते हैं कि लक्ष्मी चंचल है. लेकिन सच ये है कि लक्ष्मी चंचल नहीं अपितु लक्ष्मीवान मानव की मनोवृति चंचल होती है. वित्त एक शक्ति है, जिसके सहारे इन्सान देवता भी बन सकता है और दानव भी. लक्ष्मी को केवल भोगप्राप्ति का साधन मानने वाला मानव पतन के गहरे गर्त में समा जाता है, जब कि लक्ष्मी का मातृवत पूजन करके उसे प्रभु का प्रसाद मानने वाला मानव खुद तो पवित्र होता ही है, पर सृष्टि को भी पवन करता है. विकृत मार्ग पर व्यय की हुई अलक्ष्मी होती है, स्वार्थ में व्यय की हुई लक्ष्मी वित्त कहलाती है, परार्थे व्यय की हुई लक्ष्मी और प्रभुकार्यार्थ जो खर्ची जाती है---वह है महालक्ष्मी. महालक्ष्मी हाथी पर बैठकर सजधज के आती है. हाथी औदार्य का प्रतीक है. सांस्कृतिक कार्य में उदार हाथ से लक्ष्मी को खर्चने वाले के पास लक्ष्मी पीढियों तक रहती है. लक्ष्मी एक महान शक्ति होने के अच्छे लोगों के हाथ में ही रहनी चाहिए, जिससे उसका सुयोग्य उपयोग हो.

काल-चतुर्दशी:-जो कि नरक चतुर्दशी भी कहलाती है, इस दिन महाकाली का पूजन होता है. परपीडा में व्यय की जाए उसे अशक्ति, स्वार्थ के लिए व्यय की जाए वह शक्ति, रक्षणार्थ व्यय की जाए वह काली और प्रभुकार्यार्थ व्यय की जाए, वह महाकाली है. अपने स्वार्थ के लिए शक्ति खर्चने वाला दुर्योधन, दूसरों के चरणों पर शक्ति रखने वाला कर्ण और प्रभुकार्य में शक्ति का हवन करने वाला अर्जुन--महाभारत में, इन तीनों पात्रों का उत्कृष्ट चित्रण करके महर्षि वेदव्यास ने हमें सुस्पष्ट जीवन-दर्शन दिया है.

दीपावली:-- याने वैश्यों का हिसाब-बही खाते के पूजन का दिन. समग्र वर्ष का लेखाजोखा निकालने का दिन. इस दिन इन्सान को जीवन का भी लेखाजोखा निकालना चाहिए. राग-द्वेष, बैर-विरोध, ईर्ष्या-मत्सर तथा जीवन से कटुता दूर कर नये वर्ष के दिन में प्रेम, श्रद्धा और उत्साह बढाने का ध्यान रखना चाहिए.


दिल में जो दीपक प्रकटे तो रोज दीवाली भ्रात;
वर्ना,शुभबुद्धि वर्जित जीवन में होली है दिनरात;
कहूँ मैं अजब अनोखी बात !

दिल में यदि अन्धेरा हो तो बाहर प्रकटे हुए हजारों दीप निरर्थक बन जाते हैं. दीपक ज्ञान का प्रतीक है---दिल में दीपक जलाना अर्थात निश्चित समझदारी से दिपावली का उत्सव मनाना. धनतेरस के दिन वित्त को जीवन सार्थक करने की शक्ति मानकर महालक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए. काल-चतुर्दशी के दिन जीवन में नरक निर्माण करने वाले आलस, प्रमाद, अस्वच्छता, अनिष्ठता वगैरह नरकासुरों को मारना चाहिए. दिपावली के दिन "तमसो मा ज्योतिर्मय!" मन्त्र की साधना करते-करते जीवनपथ प्रकाशित करना चाहिए, जीवन के बही-खाते का लेखाजोखा निकालते समय जमा में ईशकृपा रहे, इसलिए प्रभुकार्य के प्रकाश से जीवन को भर देना चाहिए.

प्रभुकार्य दे पालकी वर्ना उठे जनाजा भ्रात'
एक प्रकाश दिवाली का है, दूजी होली की आग...
कहूँ मैं अजब अनोखी बात!

पुराने सभी वैरभाव भूलकर शत्रु का शुभचिंतन करना चाहिए. नया वर्ष, नई ऋतु आरम्भ याने शुभ संकल्प का दिन. भैय्यादूज के दिन स्त्री की ओर देखने की भद्रदृष्टि प्रप्त करनी चाहिए और भाई के स्नेह से समस्त स्त्री जाति को बहन के रूप में स्वीकार करना चाहिए. ऎसी सुन्दर समझ देने वाला ज्ञानदीपक यदि दिल में प्रकट हो तो हमारा जीवन सदैव दीपोत्सव महोत्सव बना रहेगा...

"ध्येय महान धरो जीवन में, वीर बनो कहती है दीवाली;
भेख धरो संस्कृति कारण, दीक्षित होके मनाओ दीवाली "

बुधवार, 1 सितम्बर 2010

श्रीकृ्ष्ण जी के अन्य सात भाई.......

      आप सभी को श्री कृ्ष्ण जन्मोत्सव की बहुत बहुत बधाई और अशेष शुभकामनाऎँ!!!! 

भारत की सभ्यता, संस्कृ्ति और दर्शन को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले और भारतीयों के उपास्य महापुरूषों में श्री रामचन्द्र जी तथा श्री कृ्ष्ण जी का नाम सबसे ऊपर आता है. इनमें भी सर्वाधिक भक्ति और पूजा भी कृ्ष्ण जी को ही मिली है. सनातन धर्म के पुराणों यथा श्रीमदभागवत तथा ब्रह्मवैवर्त और गर्ग संहिता आदि में तो श्रीकृ्ष्ण चरित्र विस्तार से है ही, वैदिक धर्म न मानने वाले बौद्ध तथा जैन धर्मों में भी उन्हे पूरी श्रद्धा मिली है. बौद्ध जातकों में भी श्रीकृ्ष्ण चरित्र  उपलब्ध है, किन्तु जैन धर्म में तो उन्हे 64 श्लाका पुरूषों और भावी तीर्थंकरों में स्थान मिला है: उन्हे नवम वासुदेव स्वीकार किया गया है. इसके अतिरिक्त श्लाका पुरूषों में 'वासुदेव' नाम की पूरी श्रेणी का होना ही जैन धर्म की कृ्ष्ण के प्रति श्रद्धा का ज्वलंत उदाहरण है. यह दूसरी बात है कि हिन्दू धर्म ग्रन्थों में श्रीकृ्ष्ण जी का जो जीवन चरित्र है, उनमें प्रयाप्त अन्तर है, ओर यूँ भी अन्तर होना तो स्वाभाविक भी है.विविध हिन्दू पुराण और महाभारत श्रीकृ्ष्ण के भाईयों के विषय में मौन है, जब कि जैन पुराणों में कृ्ष्ण के साथ साथ उनके भाईयों का भी जीवन चरित्र  है.
जैन ग्रन्थों के अनुसार बाईसंवें तीर्थंकर भगवान अरिष्टनेमी के पिता समुद्रविजय थे, और उनके छोटे भाई वासुदेव की पत्नि देवकी से कृ्ष्ण का जन्म हुआ था. जैन आगमों और परवर्ती अनेक ग्रन्थों में भी श्रीकृ्ष्ण सम्बंधी काफी अधिक विवरण प्राप्त है. प्रस्तुत लेख में श्रीकृ्ष्ण के अन्य सात भाईयों सम्बंधी जैन और जैनेतर विवरण मात्र तुलनात्मक अध्ययन के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है.
हिन्दू धर्म ग्रन्थों के अनुसार श्रीकृ्ष्ण के जीवन चरित्र के बारे में तो प्रत्येक व्यक्ति भलीभांती परिचित ही है. श्रीमदभागवत के नवम स्कन्ध में कहा गया है कि वसुदेव के रोहिणी नामक पत्नि के गर्भ से बलराम आदि पुत्र उत्पन हुए और दूसरी पत्नि देवकी के गर्भ से श्रीकृ्ष्णादि आठ पुत्र और सुभद्रा नाम की पुत्री नें जन्म लिया. कंस द्वारा देवकी के क्रमश: छ पुत्रों को मार डाला गया, सातवाँ गर्भ जो कि शेषनाग के तेजांश से था, उस गर्भ को भगवान नें योगमाया द्वारा रोहिणी के उदर में रख दिया, जो नन्द के गोकुल में रहती थी और जाहिर कर दिया कि सातंवां गर्भ नष्ट हो गया है. इसके बाद आठवें गर्भ से श्रीकृ्ष्ण स्वयं अवतरित हुए.
इस विवरण के अनुसार देवकी के छ: गर्भ कंस द्वारा नष्ट कर दिए गए और श्रीकृ्ष्ण आठवें पुत्र थे. पर जैन आगमों का अध्ययन करने पर एक विलक्षण तथा अति महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है कि देवकी के पहले छ: पुत्र मद्दिलपुर की सुलंसा के द्वारा पालित-पोषित हुए. श्रीकृ्ष्ण देवकी के आठवें नहीं बल्कि सातवें पुत्र थे----आठवां पुत्र तो कृ्ष्ण जन्म के बहुत वर्षों बाद उत्पन हुआ, जिसका नाम था " गजसुकुमार".
जैनागमों में सबसे प्राचीन ग्रन्थ "अंग सूत्र" माने जाते हैं. उनमें से आठवें 'अंतगड्दशा' नामक सूत्र में गजसुकुमाल का स्वतन्त्र जीवन चरित्र है. उसके जीवन की पूरी कथा देने के साथ ही श्रीकृ्ष्ण जी के छ: बडे भाईयों का भी महत्वपूर्ण विवरण दिया गया है. इन सातों भाईयों का जो वृ्तान्त इस सूत्र के अध्ययन से मिलता है, उसी का सारांश यहाँ इस लेख में दिया जा रहा है............
महाभारत में एक जगह श्रीकृ्ष्ण के सौतेले छोटे भाई "गद" का उल्लेख मिलता है, और  श्रीकृ्ष्ण के नामों में "गदाग्रज" और "गदपूर्वज" का भी उल्लेख है. यह भी इसी बात का सूचक है. संभव है जैन आगमों में जिसे "गजसुकुमाल" कहा गया है, उसी का "गद" के नाम से महाभारत में उल्लेख हो.
श्रीकृ्ष्ण के लघु भ्राता गजसुकुमाल:-
एकबार तीर्थंकर अरिष्टनेमी विहार करते करते द्वारिका में आ पहुंचें. उस समय उनके साथ छ: साधु थे और ये छहों एक ही माता के पेट से एक ही साथ जन्मे हुए छ: भाई थे. जैसा कि अमूमन जुडवाँ बच्चों में देखने में आता है, उन छहों भाईयों की आकृ्ति और रंगरूप भी बिल्कुल एक समान था, सब के सब श्याम वर्ण के थे. उन्होने जिस दिन दीक्षा ली थी, उसी दिन से अरिष्टनेमी भगवान की आज्ञा से निरन्तर द्वि बेला का उपवास करते रहने का नियम ले लिया था.द्वारिका में आने के बाद अपने उपवास के पारणे का समय होने पर, वे दो दो की टुकडी में विभक्त होकर भिक्षा माँगने निकले. पहले दो जन घर घर भिक्षा माँगते हुए वसुदेव पत्नि देवकी के घर पर आए. देवकी नें उन्हे बडे ही हर्षित मन से केसर के लडुओं की भिक्षा देकर वंदन-नमस्कार सहित विदा किया.
तदन्तर, उनमें से दूसरे दो भाई भी भिक्षा माँगते मांगते देवकी के द्वार पर आन खडे हुए. उनको भी देवकी नें वही लडुओं की भिक्षा देकर विदा कर दिया.
थोडी ही देर बाद, शेष दो भाईयों की तीसरी टुकडी भी फिरती फिरती देवकी के यहाँ ही पहुँच गई. देवकी नें उन्हे भिक्षा तो दे दी लेकिन ये कह भी दिया कि वासुदेव की इतनी बडी द्वारिका नगरी में श्रमणों को कहीं भिक्षा ही नहीं मिलती, जो वे बारबार एक ही घर में भिक्षा मांगने आ जाते हैं.
अब उन लोगों नें बताया कि हम एक ही घर में दोबारा से भिक्षा मांगने नहीं जा सकते. हम छ: भाई हैं मद्दिलपुर नगर के नाग नामक गृ्हस्थ के पुत्र हैं. हमने हमारी माता सुलसा के गर्भ से एक ही साथ जन्म लिया है. हम सब की आकृ्ति और रंगरूप भी बिल्कुल एक समान ही है, इसलिए आपको ऎसा लगा कि दो ही भिक्षुक बारबार एक ही घर से भिक्षा मांगने आ रहे हैं.
इतना कहकर साधु तो अपने रास्ते चले गए, लेकिन जाते जाते देवकी को एक सोच में डाल गए....वो ये कि उसके बाल्यकाल में मुक्तक ऋषि नें उनके बारे में एक भविष्यवाणी की थी, कि तुम्हारे गर्भ से एक ही समान वर्ण और आकृ्ति के नल-कुबेर जैसे आठ पुत्र जन्म लेंगें. समस्त संसार में अन्य किसी भी स्त्री को वैसे पुत्र नहीं होंगें. पर यहाँ तो प्रत्यक्ष ही उनका वचन असत्य होता हुआ दिख रहा है. सम्पूर्ण विश्व तो क्या, मालूम होता है कि यहाँ तो भारत खंड में भी अन्य स्त्रियाँ ऎसी हैं कि जिनके एक ही जैसे जन्मे हुए नल कुबेर जैसे पुत्र हैं. सोच में डूबी देवकी इस बात का स्पष्टीकरण पूछने अरिष्टनेमी भगवान के पास पहुँचती है..........
कथा का शेष भाग----ब्रेक के बाद :)

बृहस्पतिवार, 26 अगस्त 2010

संस्कार विज्ञान-----जातकर्म, नामकरण तथा अन्नप्राशन संस्कार (द्वितीय भाग)

बैजिक एवं गार्भिक दोषों की निवृ्ति के साथ साथ इस जीवन को ब्रह्मप्राप्ति के योग्य बनाना ही संस्कारों का एकमात्र उदेश्य है.इससे पूर्व के आलेख में बताए गए गर्भावस्था के वे तीन संस्कार मुख्यत: गर्भस्थ शिशु की शारीरिक पूर्णता की दृ्ष्टि से होते हैं. क्यों कि अन्तस्थ शिशु के लिए उसके प्रत्येक अव्यव अर्थात सर्वांग की पुष्टि की आवश्यकता रहती है. यदि क्रिया न भी हो सके तब भी मन्त्रों में जो अलौकिक अचिन्त्य शक्ति रहती है, केवल उसका श्रवण और उच्चारण ही अपना प्रभाव डालते हैं. शास्त्रोक्त क्रिया का अनुष्ठान मन्त्र न बोलने पर भी एक विशेष भाव को जन्म देता है, जिससे गर्भस्थ शिशु की पुष्टि होती है.
जातकर्म संस्कार शिशु के उत्पन होने पर होता है किन्तु नालच्छेदन से पूर्व. अपने माता-पिता के साथ उसके सम्बंध को दृ्ड करने की यह एक पद्धति है. पुत्र, पिता के अंग-अंग का रस है. वह पिता के ह्रदय का ही मूर्त पिण्ड है. समझिए कि पिता ही पुत्र के रूप में प्रकट हुआ है. उपनिषदों में इसी कारण से पत्नि को "जाया" कहा गया है. पिता पत्नि के द्वारा पुत्र रूप में प्रकट होता है. "बीज" पिता--"क्षेत्र" माता. यह जातकर्म संस्कार पुत्र के ह्रदय में माता-पिता के प्रति श्रद्धा एवं आदर युक्त सम्बन्ध उत्पन करता है यही संस्कार विकसित होकर 'मातृ देवो भव:', 'पितृ देवो भव:' के भाव को दृ्ड करता है. यह कहने की आवश्यकता नहीं कि गर्भस्थ शिशु के संस्कार स्थूल शरीर की पुष्टि के लिए होते हैं और जातकर्म आदि संस्कार जीवन कालीन भावों की परिपुष्टि के लिए होते हैं.
नामकरण संस्कार अपने पूर्वजों के साथ सम्बन्ध की परिपुष्टि के अनन्तर स्वविषयक योग्यता का आधान करने के लिए होता है. नाम ऎसा होना चाहिए जो अपनी प्राचीन परम्परा के साथ कडी जोडकर नवीन नवीन गुणों का समुन्मेष करने वाला हो. प्राकृ्त वस्तुओं के नाम, परिणाम क्रम से होते हैं. प्राकृ्त परिणाम के अन्तिम रूप पंचभूत हैं, अन्य सब रूप कार्याभास ही हैं. समष्टि से पृ्थक व्यष्टि का नामकरण देश, काल, जाति, सम्प्रदाय, परिवार-परम्परा के अनुरूप होता है. ये नाम जब शास्त्रोक्त रीति से रखे जाते हैं तो यज्ञ यागादि कार्य में इनके द्वारा संकल्प करने की योग्यता आती है. नाम में अचिन्त्य शक्ति होती है. वह सूक्ष्म शरीर में सुषुप्त सदगुणों को जगाता है. इसी के साथ मन्त्र पूत नाम, अन्त:करण शुद्धि में भी सहायक होता है. तभी सनातन धर्मावलम्बियों में आज भी प्राय: सच्चिदानन्द वाचक नाम रखे जाते हैं.
अन्नप्राशन संस्कार---माता के रस रक्त से ही बालक के शरीर की पुष्टि होती है. अत: माता का दूध शिशु के लिए सर्वापेक्षया अधिक हितकारी होता है. परन्तु अन्तस्थ भावना की परिपुष्टि के लिए अन्न की विशेष आवश्यकता होती है. अन्न से ही 'मन' बनता है. 'जल' से 'प्राण' और 'तेज' से 'वाक'. अन्न में इन तीनों का ही समावेश है. यदि अन्न पवित्र एवं योग्य होगा तो शरीर में मन, प्राण एवं वाणी का विकास होगा. अतैव "अन्नप्राशन संस्कार" केवल लौकिक बल की वृ्द्धि एवं संरक्षण के लिए ही आवश्यक नहीं है, इसके द्वारा अध्ययन एवं चिन्तन के बल की भी प्राप्ति होती है. व्यवहारिक जगत का मूलभूत उपादान अन्न ही है. अतएव अन्नप्राशन एक ऎसा संस्कार है, जो कि मनुष्य की उन्नति में सहायक है. मन्त्र, देवता, पारम्परिक संस्कार, एवं ब्राह्मण, माता-पिता के आशीर्वाद से अन्न में बल, बुद्धि एवं भोजन मर्यादा की प्रतिष्ठा होती है. 'अन्न बहु कुर्वीत' अन्न का आदर करना चाहिए. यह संस्कार बाल्यवस्था में ही होना आवश्यक है....
क्रमश:........

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

संस्कार विज्ञान------(प्रथम भाग)

किसी भी मनुष्य में अपने पूर्वजन्म के कर्मों के संस्कार तो रहते ही हैं. गर्भ के, माता-पिता के, उनकी वंशानुगत क्रमधारा के भी संस्कार रहते हैं. अब संस्कार हैं तो उनमें से कुछ अच्छे होंगें तो कुछ बुरे भी. बुरे संस्कारों को विकार कहा जाता है. जो जडता की ओर ले जाए सो विकार. जो भीतर के विकारों को मिटा दे वो संस्कार. संस्कार माने सँवारना, सुधारना. जैसे-----दर्पण को स्वच्छ करना, चमकाना. जैसे रत्न जब खान से निकाला जाता है तो उसमें मिट्टी लगी होती है, बेडौल होता है. उसको साफ करते हैं, चमकाते हैं; छंटाई-घिसाई भी करते हैं और पालिश भी. उसकी चमक, स्निग्धता प्रकट हो जाने पर भी , उसे पिरोने के लिए जो छिद्राभाव होता है. उसकी भी छिद्र करके पूर्ती की जाती है. हमारे संस्कार भी कुछ इसी प्रकार के हैं. बीजगत और गर्भगत दोषों को मिटाना और जीवन को चेतनोन्मुख करके पुरूषार्थ की प्राप्ति के योग्य बनाना संस्कारों का प्रयोजन है. इसी को हमारे शास्त्रों में दोषापनयन, गुणाधान एवं हीनांगपूर्ती के नाम से कहा गया है.
जैसे मन्दिर में देवता की स्थापना के लिए शुद्धि की जाती है, वैसे ही माता के गर्भाशय में बीज की स्थापना के लिए भूमी शुद्धि अथवा पीठ शुद्धि आवश्यक है. बाह्य रूप से शरीर शुद्धिकरण के लिए जैसे अनेक प्रक्रियाएं हैं, उसी प्रकार आन्तर पीठ शुद्धि के लिए शास्त्रीय संस्कार क्रिया अपनाई जाती है. शुभ समय, शुभ स्थल, मन्त्रोचारण, देवता का अनुग्रह एवं गर्भाधान के पूर्वांग----जीव-चैतन्य-रूप महती शक्ति के प्रतिष्ठापन की योग्यता उत्पन करते हैं. यह सम्पूर्ण क्रिया शब्द शक्ति के प्रवाह एवं संकल्पयुक्त क्रिया के द्वारा ही सम्पन्न की जाती है.
पुंसवन संस्कार में मन्त्र, देवानुग्रह, माता-पिता के शुभ संकल्प के साथ साथ औषधी विशेष का भी प्रयोग होता है. इससे भावी संतान दीर्घायु, स्वस्थ, सुन्दर, हष्ट-पुष्ट, बलिष्ठ, तेजस्वी, बुद्धिमान एवं सदाचार-सम्पन्न होती है. वह पुत्र हो अथवा पुत्री, इस संस्कार से सदाचार सदभाव एवं सदगुण की सम्पदा निश्चित रूप से प्राप्त होती है.
सीमोन्तोनयन संस्कार से माता के चित्त का प्रसादन होता है. माता का मन तृ्प्त, संतुष्ठ एवं प्रसन्न रहे, उसका प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर तो पूर्ण रूप से पडता ही है. जिससे कि उसके शरीर में सुखी रहने की क्षमता उत्पन होती है. यदि माता उदास, निराश, दुखी, रोती-कलपती एवं भविष्य के प्रति घबराहट लिए हुए रहे तो बालक पर उसका प्रभाव भी तो वैसा ही होगा. सो, इसलिए इस संस्कार में पिता उसके सुख सौमनस्य का सारा उतरदायित्व सम्भाल लेता है, जिससे कि वह निश्चिंत रहे. 
गर्भावस्था के ये तीन संस्कार मुख्यत: गर्भस्थ शिशु की शारीरिक पूर्णता की दृ्ष्टि से होते हैं, क्योंकि अन्तस्थ शिशु के लिए उसके प्रत्येक अवयव अर्थात सर्वांग की पुष्टि की आवश्यकता रहती है. यदि क्रिया न भी हो सके तब भी मन्त्रों में जो अलौकिक अचिन्त्य शक्ति रहती है, केवल उसका श्रवण और उच्चारण भी अपना वही प्रभाव डालता हैं, जो कि इस सम्पूर्ण क्रिया का है. और शास्त्रोक्त क्रिया का अनुष्ठान मन्त्र न बोलने पर भी एक विशेष भाव को जन्म देता है, जिससे गर्भस्थ शिशु की पुष्टि होती है.

( हम भले ही संस्कारों से संस्कृ्त न हों किन्तु हमें संस्कारों का ज्ञान रखना आवश्यक है. अत एव मूलभूत संस्कारों का विस्तृ्त विवेचन ही इस लेखमाला का उदेश्य है. प्रस्तुत पोस्ट को इस अति महत्वपूर्ण विषय की एक भूमिका मात्र ही समझा जाए. आगामी लेख में बात करते हैं---शिशु के जन्म लेने के पश्चात किए जाने वाले संस्कारों के विषय में )

सोमवार, 26 जुलाई 2010

जीवन के ये 17 मूल आधार

1. आनन्द के लिए = संगीत

2. खाने के लिए = गम

3. पीने के लिए = क्रोध

4. निगलने के लिए = अपमान

5. व्यवहार के लिए = नीति

6. लेने के लिए = ज्ञान

7. देने के लिए = दान

8. जीतने के लिए = प्रेम

9. धारणे के लिए = धैर्य

10. तृ्प्ति के लिए = संतोष

11. त्यागने के लिए = लोभ

12. करने के लिए = सेवा

13. प्राप्त करने के लिए = यश

14. फैंकने के लिए = ईर्ष्या

15. छोडने के लिए = मोह

16. रखने के लिए = इज्जत

17. बोलने के लिए = सत्य

रविवार, 25 जुलाई 2010

संपूर्ण विश्व का साहित्य जिनकी जूठन कहा जाता है-------(गुरू पूर्णिमा पर विशेष)

भारतीय जीवन परम्परावादी है। हमारे ऋषि-मुनियों ने बहुत सोच विचार कर, ज्ञान, विज्ञान और समय की कसौटी पर सौ प्रतिशत कस कर कुछ परम्पराओं का निर्माण किया। इन्हीं के कारण हजारों सालों के विदेशी और विधर्मी आक्रमणों के बाद भी भारत आज तक सीना ताने खडा है। ऐसी ही एक परम्परा है गुरुपूर्णिमा, जिसे 'व्यास पूर्णिमा` भी कहा जाता हैं। वेदों के संकलनकर्ता और सम्पादक तथा महाभारत के लेखक महर्षि व्यास का जन्म इसी आज के दिन हुआ था। व्यास जी का महत्व इससे भी प्रकट होता है कि संपूर्ण विश्व के साहित्य को उनकी जूठन कहा जाता है (व्यासोच्छिष्टम् जगत्सर्वम्)। इसका अर्थ स्पष्ट है कि व्यास जी ने अपने जीवन में इतना अधिक काम किया कि उनका नाम एक संस्था और पदवी ही बन गया। आज भी जब कोई कथा होती है, तो प्रवचनकार को कथा व्यास और उसके मंच को व्यासपीठ कहा जाता है। यह व्यास जी के महान कार्यों को आज तक दिया जाने वाला तुच्छ सम्मान ही है।
श्री वेद व्यास जी
 ऐसे श्रेष्ठ महापुरुष के जन्मदिवस को व्यास पूर्णिमा और आदि गुरु होने के कारण गुरु पूर्णिमा कहना स्वाभाविक ही है। प्राचीन काल में इसी दिन विद्यार्थी अपनी विद्या आरम्भ करते थे। उनके अभिभावक बच्चे को गुरु के पास ले जाकर उसे गुरु को सौंपते थे। गुरु भी बच्चे को अपनी संतान के समान प्रेम देने के आश्वासन के साथ स्वीकार करते थे। छोटी अवस्था में तो बच्चे अपने घर के निकटवर्ती विद्यालय में जाते थे; पर कुछ बड़े होने पर वे गुरुकुल में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। इस प्रकार व्यास पूर्णिमा का पर्व हर गांव और मोहल्ले में विद्यारम्भ का एक बृहत् उत्सव बन जाता था।
शिक्षा का प्राचीन भारत में कितना महत्व था, इसे इसी से समझा जा सकता है कि गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक के 16 संस्कारों में 'विद्यारम्भ` को एक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। बच्चा किसी भी वर्ग, वर्ण या लिंग का हो, उसके लिए शिक्षा अनिवार्य और नि:शुल्क थी। निर्धन बालक सुदामा और राजपरिवार के श्रीकृष्ण सांदीपनि गुरु के पास एक साथ पढ़ते थे। गुरुकुल में गुरु और गुरुपत्नी के सान्निध्य में सब बच्चे एक परिवार की तरह रहते थे। इस प्रकार मिले संस्कार जीवन भर अमिट रहना स्वाभाविक ही है।
एक बात ओर कि, तब शिक्षा का अर्थ केवल किताबी ज्ञान नहीं था। इसीलिए भाषा, राजनीति, भौतिकी, कला, चिकित्सा, रसायन,विज्ञान, कूटनीति और तंत्र-मंत्र की शिक्षा के साथ ही लकड़ी काटने, खेती करने, गोपालन से लेकर रसोई तक के काम छात्र प्रसन्नता से करते थे। शिक्षा पूरी होने पर बच्चे के अभिभावक अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार गुरु को जो भी देते थे, वे उसे प्रेम से स्वीकार करते थे। वह गांवों की जागीर से लेकर लौंग के दो दाने तक कुछ भी हो सकता था। साम्यवादी भले ही कितना ढिंढोरा पीटें; पर समता और समानता का ऐसा उदाहरण इतिहास में मिलना कठिन है।
यहां हमें शिक्षा और विद्या का अंतर भी समझना होगा। शिक्षा का अर्थ जहां व्यावहारिक जीवन के लिए उपयोगी ज्ञान है, वहां विद्या का अर्थ व्यावहारिक के साथ ही सामाजिक ज्ञान भी है। विद्या में वह सब संस्कार आते हैं, जिनसे व्यक्ति सामाजिक और राष्ट्रीय प्राणी बनता है। विद्या हर व्यक्ति को 'मैं और मेरा` से ऊपर उठकर 'हम और हमारा` की ओर जाने को प्रेरित करती है। इसीलिए कहा है सा विद्या या विमुक्तये। अर्थात विद्या व्यक्ति को उसके जीवन में व्याप्त दूषित पूर्वाग्रहों से मुक्त करती है। इसीलिए इस महत्वपूर्ण संस्कार का नाम विद्यारम्भ रखा गया, शिक्षारम्भ नहीं।
गुरु का भारतीय जीवन पद्धति में और भी अनेक कारणों से महत्व है। सबसे पहली बात तो यह कि न केवल शिक्षा अपितु समाज जीवन के हर क्षेत्र में गुरु की आवश्यकता बताई गयी है। मां अपने बच्चों की प्रथम गुरु कही जाती है। क्योंकि वही उन्हें चलना, बोलना और किस से क्या व्यवहार करना, यह बताती है। बालिकाओं को मां और बालकों को प्राय: पिता भावी जीवन के लिए तैयार करते हैं। इसलिए बच्चे का पहला विद्यालय उसका घर है, यह कहा जाता है।
इस घर के बाद किताबी ज्ञान के लिए बच्चा घर से कुछ दूर के विद्यालय में अध्यापक के निर्देशन में शिक्षा पाता है। भारतीय परम्परा में शिक्षा समाप्ति के बाद दीक्षा का भी बड़ा महत्व है। दीक्षा से ही शिक्षित युवा यह जान पाता है कि उसे शिक्षा का उपयोग किस दिशा में करना है। दीक्षा के अभाव में शिक्षा का कैसा दुरुपयोग होता है, इसके हर दिन सैकड़ों उदाहरण हम देखते हैं। बंदूक चलाने की शिक्षा के बाद यदि दीक्षा न हो, तो वह किसी निरपराध की हत्या भी करा सकती है। जबकि सही दीक्षा हो, तो उससे देश की रक्षा की जा सकती है। इसलिए शिक्षा के बराबर ही दीक्षा का भी महत्व है।
केवल किताबी ज्ञान ही क्यों, सब प्रकार के जीवनोपयोगी व्यवहारिक कार्य भी गुरु के निर्देशन में ही तो सीखे जा सकते हैं। सच तो यह है कि जीवन का चाहे कोई भी क्षेत्र हो, गुरु के सान्निध्य के बिना उद्धार संभव नहीं है। इसीलिए जब दशरथ के दरबार में विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को मांगने आये, तो वे संकोच में पड़ गये। ऐसे में गुरु वशिष्ठ ने राजा को आश्वस्त किया, क्योंकि वे जानते थे कि राम का अवतार जिस काम के लिए हुआ है, उसके लिए उन्हें विश्वामित्र जैसे गुरु का सान्निध्य मिलना आवश्यक है।
कौरव और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य और कर्ण के गुरु परशुराम की कहानी कौन नहीं जानता ? शिवाजी के जीवन में परिवर्तन तब ही हुआ, जब उन्हें समर्थ स्वामी रामदास जैसा श्रेष्ठ गुरु मिला। विजयनगर साम्राज्य के निर्माता हरिहर और बुक्क के जीवन में स्वामी विद्यारण्य ने परिवर्तन किया। बन्दा बैरागी की जीवन को सही दिशा गुरु गोविंद सिंह ने दी। रामकृष्ण परमहंस के कारण विवेकानंद का; विवेकानंद के कारण मार्गरेट नोबेल (भगिनी निवेदिता) का और स्वामी विरजानंद के कारण ऋषि दयानंद का जीवन बदल गया। वीर सावरकर और श्यामजी कृष्ण वर्मा ने न जाने कितने युवकों के मन में क्रांति का बीज बोया। गुरु शिष्य के अन्तर्मन में छिपी प्रतिभा को पहचान कर उसे पल्लवित, पुष्पित और प्रस्फुटित होने का अवसर प्रदान करता है। वह शिष्य की कमियों को प्रेम से दूर करता है और फिर उसे अपने से भी आगे बढ़ता देखकर प्रसन्न होता है।
गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़-गढ़ काढ़े खोट
अंदर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट।।
पश्चिमी चिंतन में गुरु का इतना महत्व नहीं है। वहां शिक्षक और छात्र तो हैं; पर गुरु और शिष्य नहीं। वहां शिक्षा तो है; पर विद्या और दीक्षा नहीं। शिक्षक अपने परिवार का पेट भरने के लिए पढ़ाता है और छात्र भी इसीलिए पढ़ता है कि वह भविष्य में परिवार पाल सके। इसी में से वेतन, ट्यूशन, नकल, नंबर बढ़ाने और हिंसक आंदोलन जैसी प्रवृत्तियां जन्मी हैं, जिन्होंने शिक्षा जगत का कबाड़ा कर दिया है। इसीलिए अब शिक्षक छात्रों से डरते हैं। विद्यालय नग्नता, गुंडागर्दी, दलाली और राजनीति के अड्डे बन गये हैं। यदि इस दृश्य को बदलना है, तो गुरु परम्परा को पुनर्जीवित करना होगा।
आज गुरुपूर्णिमा के इस पावन पर्व पर हमें अपने कर्तव्यों का स्मरण होना चाहिए; पर ये कर्तव्य निरी बातों से नहीं,अपितु अपने चरित्र और व्यवहार से पूरे होंगें। हमारे पूर्वजों ने हमें स्मरण भी कराया है ---
एतद्देश प्रसूतस्य, सकाशादग्रजन्मन:
         स्वं स्वं चरित्रन् शिक्षेरन, पृथिव्य: सर्वमानव:।। (मनुस्मृति)
गुरु की महिमा अपार है। इसका न वर्णन संभव है और न लेखन। यह शब्दातीत है। गुरु की वाणी ही नहीं, उसका स्पर्श और दृष्टि ही व्यक्ति के जीवन को बदलने के लिए पर्याप्त है।
सब धरती कागद करूं, लेखनी सब बनराय
सात समुद्र की मसि करूं, गुरु गुण लिखा न जाय।।
इसीलिए जब वाणी मौन हो जाती है और मस्तिष्क विचार शून्य; तब यही कह कर संतोष करना पड़ता है---गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वर:
       गुरु: साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नम:।।(स्कन्दपुराण (गुरु गीता))
गुरुपूर्णिमा का पर्व हमें यही याद दिलाने आया है।

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